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शनिवार, 27 फ़रवरी 2016

छन्दःशास्त्रम्

!!!---: छन्दःशास्त्रम् :---!!!
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छन्द संस्कृत वांङ्मय में सामान्यतया लय को बताने के लिये प्रयोग किया गया है। विशिष्ट अर्थों में छन्द कविता या गीत में वर्णों की संख्या और स्थान से सम्बन्धित नियमों को कहते हैं, जिनसे काव्य में लय और रंजकता आती है। छोटी-बड़ी ध्वनियाँ, लघु-गुरु उच्चारणों के क्रमों में, मात्रा बताती हैं और जब किसी काव्य रचना में ये एक व्यवस्था के साथ सामंजस्य प्राप्त करती हैं, तब उसे एक शास्त्रीय नाम दे दिया जाता है और लघु-गुरु मात्राओं के अनुसार वर्णों की यह व्यवस्था एक विशिष्ट नाम वाला छन्द कहलाने लगती है, जैसेः--- आर्या, इन्द्र्वज्रा, गायत्री छन्द इत्यादि।

इस प्रकार की व्यवस्था में मात्रा अथवा वर्णॊं की संख्या, विराम, गति, लय तथा तुक आदि के नियमों को भी निर्धारित किया गया है, जिनका पालन कवि को करना होता है। इस दूसरे अर्थ में यह अंग्रेजी के मीटर अथवा उर्दू फ़ारसी के रुक़न (अराकान) के समकक्ष है। हिन्दी साहित्य में भी परंपरागत रचनाएँ छन्द के इन नियमों का पालन करते हुए रची जाती थीं, यानि किसी न किसी छन्द में होती थीं। विश्व की अन्य भाषाओँ में भी परंपरागत रूप से कविता के लिये छन्द के नियम होते हैं।

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छन्दों की रचना और गुण-अवगुण के अध्ययन को "छन्दशास्त्र" कहते हैं। चूँकि, आचार्य पिङ्गल द्वारा रचित 'छन्दःशास्त्र' सबसे प्राचीन उपलब्ध ग्रन्थ है, इस शास्त्र को "पिङ्गलशास्त्र" भी कहा जाता है।

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इतिहास
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प्रचीन काल के ग्रंथों में संस्कृत में कई प्रकार के छन्द मिलते हैं जो वैदिक काल के जितने प्राचीन हैं। वेद के सूक्त भी छन्दबद्ध हैं। पिङ्गल द्वारा रचित "छन्दशास्त्र" इस विषय का मूल ग्रन्थ है। छन्द की सबसे पहले चर्चा ऋग्वेद में हुई है। यदि गद्य की कसौटी ‘व्याकरण’ है तो कविता की कसौटी "छन्दशास्त्र" है। पद्यरचना का समुचित ज्ञान छन्दशास्त्र की जानकारी के बिना नहीं होता। काव्य ओर छन्द के प्रारम्भ में ‘अगण’ अर्थात ‘अशुभ गण’ नहीं आना चाहिए।

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शब्दार्थ
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वाक्य में प्रयुक्त अक्षरों की संख्या एवं क्रम, मात्रा-गणना तथा यति-गति से सम्बद्ध विशिष्ट नियमों से नियोजित पद्यरचना ‘'छन्द'’ कहलाती है। छन्दस् शब्द 'छद' धातु से बना है। इसका धातुगत व्युत्पत्तिमूलक अर्थ है - 'जो अपनी इच्छा से चलता है'। इसी मूल से स्वच्छंद जैसे शब्द आए हैं । अत: छंद शब्द के मूल में गति का भाव है।

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किसी वाङमय की समग्र सामग्री का नाम साहित्य है। संसार में जितना साहित्य मिलता है ’ ऋग्वेद ’ उनमें प्राचीनतम है। ऋग्वेद की रचना छंदोबद्ध ही है। यह इस बात का प्रमाण है कि उस समय भी कला व विशेष कथन हेतु छंदो का प्रयोग होता था।छंद को पद्य रचना का मापदंड कहा जा सकता है। बिना कठिन साधना के कविता में छंद योजना को साकार नहीं किया जा सकता।

वैदिकच्छन्दसां प्रयोजनमाह आचार्यो वटः –

स्वर्यं यशस्यमायुष्यं पुण्यं वृध्दिकरं शुभम् ।
कीर्तिमृग्यं यशस्यञ्च छन्दसां ज्ञानमुच्यते ॥ इति

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छंद के अंग
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छंद के निम्नलिखित अंग होते हैं -

(1.) गति - पद्य के पाठ में जो बहाव होता है उसे गति कहते हैं।

(2.) यति - पद्य पाठ करते समय गति को तोड़कर जो विश्राम दिया जाता है उसे "यति" कहते हैं।

(3.) तुक - समान उच्चारण वाले शब्दों के प्रयोग को तुक कहा जाता है। पद्य प्रायः "तुकान्त" होते हैं।

(4.) मात्रा - वर्ण के उच्चारण में जो समय लगता है उसे मात्रा कहते हैं। मात्रा २ प्रकार की होती है लघु और गुरु। ह्रस्व उच्चारण वाले वर्णों की मात्रा लघु होती है तथा दीर्घ उच्चारण वाले वर्णों की मात्रा गुरु होती है। लघु मात्रा का मान १ होता है और उसे। चिह्न से प्रदर्शित किया जाता है। इसी प्रकार गुरु मात्रा का मान मान २ होता है और उसे ऽ चिह्न से प्रदर्शित किया जाता है।

(5.) गण - मात्राओं और वर्णों की संख्या और क्रम की सुविधा के लिये तीन वर्णों के समूह को एक गण मान लिया जाता है। गणों की संख्या ८ है -

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१- यगणः (।ऽऽ),

२- मगणः (ऽऽऽ),

३- तगणः (ऽऽ।),

४- रगणः (ऽ।ऽ),

५- जगणः (।ऽ।),

६- भगणः (ऽ।।),

७- नगणः (।।।)

८- सगणः (।।ऽ)

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गणों को आसानी से याद करने के लिए एक सूत्र बना लिया गया है- "यमाताराजभानसलगा।"

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सूत्र के पहले आठ वर्णों में आठ गणों के नाम हैं। अन्तिम दो वर्ण ‘ल’ और ‘ग’ छन्दशास्त्र के दग्धाक्षर हैं। जिस गण की मात्राओं का स्वरूप जानना हो उसके आगे के दो अक्षरों को इस सूत्र से ले लें जैसे ‘मगण’ का स्वरूप जानने के लिए ‘मा’ तथा उसके आगे के दो अक्षर- ‘ता रा’ = मातारा (ऽऽऽ)।

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‘गण’ का विचार केवल वर्ण वृत्त में होता है मात्रिक छन्द इस बंधन से मुक्त होते हैं।

। ऽ ऽ ऽ । ऽ । । । ऽ

य मा ता रा ज भा न स ल गा

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गण         चिह्न  
उदाहरण--- ----प्रभाव
यगण (य) ।ऽऽ  नहाना -----शुभ
मगण (मा) ऽऽऽ आजादी--- शुभ
तगण (ता) ऽऽ।  चालाक ----अशुभ
रगण (रा) ऽ।ऽ  पालना ------अशुभ
जगण (ज) ।ऽ।  करील ------अशुभ
भगण (भा) ऽ।।  बादल ------शुभ
नगण (न) ।।।    कमल -------शुभ
सगण (स) ।।ऽ  कमला ------अशुभ

१- यगणः यमाता ।ऽऽ

२- मगणः मातारा ऽऽऽ

३- तगणः ताराज ऽऽ।

४- रगणः राजभा ऽ।ऽ

५- जगणः जभान ।ऽ।

६- भगणः भानस ऽ।।

७- नगणः नसल ।।।

८- सगणः सलगा ।।ऽ

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छंद के प्रकार
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(1.) मात्रिक छंद ː जिन छंदों में मात्राओं की संख्या निश्चित होती है उन्हें मात्रिक छंद कहा जाता है। जैसे - दोहा, रोला, सोरठा, चौपाई

(2.) वार्णिक छंद ː वर्णों की गणना पर आधारित छंद वार्णिक छंद कहलाते हैं। जैसे - घनाक्षरी, दण्डक

(3.) वर्णवृत ː सम छंद को वृत कहते हैं। इसमें चारों चरण समान होते हैं और प्रत्येक चरण में आने वाले लघु गुरु मात्राओं का क्रम निश्चित रहता है। जैसे - द्रुतविलंबित, मालिनी

(4.) मुक्त छंदː भक्तिकाल तक मुक्त छंद का अस्तित्व नहीं था, यह आधुनिक युग की देन है। इसके प्रणेता सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' माने जाते हैं। मुक्त छंद नियमबद्ध नहीं होते, केवल स्वछंद गति और भावपूर्ण यति ही मुक्त छंद की विशेषता हैं।

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रविवार, 21 फ़रवरी 2016

वैदिक गणित

!!!---: वैदिक गणित :---!!!
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।। ओम्।।
स्वामी भारती कृष्ण तीर्थ जी महाराज द्वारा रचित वैदिक गणित का एक
सूत्र :----
"यावदूनं तावदूनीकृत्य वर्ग च योजयेत्"
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105 का वर्ग निकलना हो तो आधार से (100)से जितना ज्यादा (5) जोड़ेगे व् उसका वर्ग करके लिख देगे।
105 आधार से 5 ज्यादा 105+5 =110
5 का वर्ग 25 को 110 पर रख देंगे
11025 यही वर्ग हैः--
105 का वर्ग 11025
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12 का आधार, 10 से 2 ज्यादा
12+2=14& 2का वर्ग 4
144
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92 का वर्ग आधार से 8 कम 92 से 8 कम करेगे
92 - 8 = 84 & 8 का वर्ग 64 को 84 पर रखेगे
8464
92 का वर्ग 8464 हैः---
ये हे वैदिक गणित सरल और मजेदार
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शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2016

निरुक्तम्

!!!---: निरुक्त नामक वेदांग :---!!!
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निरुक्त वेदपुरुष का श्रोत्र है---"निरुक्तं श्रोत्रमुच्यते ।" सम्प्रति उपलब्ध निरुक्त यास्ककृत है । इस निरुक्त का आधार ग्रन्थ निघण्टु है । इसका कर्त्ता भी यास्क ही माने जाते है । इसे वैदिक कोष माना जाता है ।

निघण्टु में पाँच अध्याय है । इन्हें तीन भागों में बाँटा गया है । इसके आदि के तीन अध्यायों को (1.) "नैघण्टुक-काण्ड", चौथे अध्याय को (2.) "नैगमकाण्ड" (ऐकपदिककाण्ड) और अन्तिम पाँचवे अध्याय को (3.) "देवतकाण्ड" कहा जाता है ।

इसके प्रथम अध्याय में 17 खण्ड, 407 शब्द, द्वितीय में 22, 452 शब्द, तृतीय में 30, 402 शब्द, चतुर्थ में 3, 281 शब्द और पञ्चमाध्याय में 6 खण्ड, 151 शब्द हैं । इस प्रकार निघण्टु में वेद के कुल 1863 शब्दों का संग्रह है । निघण्टु पर एक ही व्याख्या उपलब्ध होती है--"निघण्टु-निर्वचनम्" । इसके कर्त्ता देवराज यज्वा हैं । इसकी व्याख्या अतीव प्रामाणिक और उपादेय है ।

निरुक्त का महत्त्व
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व्याकरण और कल्प की तुलना में निरुक्त अधिक महत्त्वपूर्ण है । व्याकरण से केवल शब्द का ज्ञान होता है और कल्प से केवल मन्त्रों के विनियोग का ज्ञान होता है, किन्तु निरुक्त से शब्दों के अर्थ का ज्ञान होता है । अर्थ-ज्ञान के पश्चात् ही यज्ञों में मन्त्रों का विनियोग होता है । अर्थ-ज्ञान के पश्चात् शब्द-ज्ञान सरल हो जाता है ।

निरुक्त का लक्षण
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आचार्य सायण के अनुसार निरुक्त का लक्षण हैः---

"अर्थावबोधे निरपेक्षतया पदजातं यत्रोक्तं तन्निरुक्तम् ।"

अर्थः---अर्थ-ज्ञान के विषय में, जहाँ स्वतन्त्र रूप से पदसमूह का कथन किया गया है, वह "निरुक्त" कहलाता है । यास्क ने स्वयमेव निरुक्त और व्याकरण के सम्बन्ध को स्पष्ट किया हैः---

"तदिदं विद्यास्थानं व्याकरणस्य कार्त्स्न्यम् ।" (निरुक्त--1.5)

इससे ज्ञात होता है कि व्याकरण और निरुक्त का घनिष्ठ सम्बन्ध है । वस्तुतः निरुक्त के ज्ञान के लिए व्याकरण का ज्ञान होना आवश्यक है । यास्क ने आचार्यों को सावधान किया है कि जिसे व्याकरण न आता हो, उसे निरुक्त न पढायें--

"नावैयाकरणाय.....निर्ब्रूयात् ।" (निरुक्त--2.1.4)

निरुक्त का प्रतिपाद्य विषय है---वैदिक शब्दों का निर्वचन । यह निरुक्ति पाँच प्रकार से होती हैः---

"वर्णागमो वर्णविपर्ययश्च द्वौ चापरौ वर्णविकारनाशौ ।
धातोस्तदर्थातिशयेन योगस्तदुच्यते पञ्चविधं निरुक्तम् ।।"

(1.) वर्णागम के द्वारा---शब्द के निर्वचन के समय यदि किसी अन्य वर्ण की आवश्यकता पडे तो उसे ले लेना चाहिए, मूल धातु में वह वर्ण न हो तो भी , जैसे--वार--द्वार ।

(2.) वर्णविपर्यय के द्वारा---शब्द के निर्वचन में वर्णों को आगे या पीछे उद्देश्य के अनुसार कर लेना चाहिए । जैसे--द्योतिष्---ज्योतिष् । कसिता---सिकता ।

(3.) वर्णविकार के द्वारा---मूल शब्दों के उच्चारण में परिवर्तन करके, जैसे---वच--उक्तिः ।

(4.) वर्णनाश के द्वारा---मूल धातु में किसी वर्ण का लोप करके---अस्---स्तः, दा---प्रत्तम्, गम्--गत्वा, राजन्---राजा, गम्--जग्मुः, याचामि--यामि ।

(5.) धातु का अर्थ बढा कर---धातु का उससे भिन्न अर्थ के साथ योग ।

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निरुक्त का परिचय
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निरुक्त में कुल 14 अध्याय हैं । अन्तिम के दो अध्याय परिशिष्ट माने जाते हैं । निरुक्त के भी तीन ही विभाग किए गए हैंः--

(1.) नैघण्टुक-काण्ड
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निरुक्त के भी प्रारम्भ के तीन अध्यायों को "नैघण्टुक-काण्ड" ही कहा जाता है । इसके प्रथम अध्याय में यास्क ने पद के चार भेद माने हैं--नाम, आख्यात, उपसर्ग और निपात । निरुक्त के द्वितीय और तृतीय अध्यायों में पर्यायवाची शब्दों का निर्वचन किया गया है । इनमें 1341 पद हैं, जिनमें यास्क ने 350 पदों की निरुक्ति की है ।

(2.) नैगमकाण्ड
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निरुक्त के चौथे-पाँचवें अध्याय को "नैगमकाण्ड" कहा जाता है । इसे "ऐकपदिक" भी कहते हैं । इन अध्यायों में तीन प्रकार के शब्दों का निर्वचन हुआ हैः--

(क) एक अर्थ में प्रयुक्त अनेक शब्द (पर्यायवाची शब्द), (ख) अनेक अर्थों में प्रयुक्त एक शब्द (अनेकार्थक शब्द), (ग) ऐसे शब्द, जिनकी व्युत्पत्ति (संस्कार) ज्ञात नहीं है (अनवगतसंस्कार शब्द) । इनमें कुल 179 पद हैं ।

(3.) दैवतकाण्ड
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निरुक्त के सात से बारह अध्यायों को "दैवतकाण्ड" कहा जाता है । इस काण्ड में वेद में प्रधान रूप से स्तुति किए गए देवताओं के नामों का निर्वचन है । इनमें कुल 155 पद हैं ।
इस प्रकार 12 अध्यायों में कुल 1675 पद हैं ।

निरुक्त में तीन प्रकार के देवता कहे गए हैं---
(क) पृथिवीस्थानीय देवता---अग्नि ।
(ख) अन्तरिक्षस्थानीय देवता---इन्द्र या वायु ।
(ग) द्युस्थानीय देवता--सूर्य ।

(4.) परिशिष्ट
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निरुक्त के तेरहवें और चौदहवें अध्याय को परिशिष्ट माना जाता है । इनमें अग्नि की स्तुति और ब्रह्म की स्तुति है ।

निरुक्त का महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त है कि सभी नाम शब्द धातुज हैं--"सर्वाणि नामानि आख्यातजानि ।"

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बारह निरुक्तकार
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दुर्गाचार्य ने 14 निरुक्तकारों का उल्लेख किया है--निरुक्तं चतुर्दशप्रभेदनम् । निरुक्त में स्वयं यास्क ने 12 निरुक्तकारों का उल्लेख किया हैः---(1.) अग्रायण, (2.) औपमन्यव, (3.) औदुम्बरायण, (4.) और्णवाभ, (5.) कात्थक्य, (6.) क्रौष्टुभि, (7.) गार्ग्य, (8.) गालव, (9.) तैटीकि, (10.) वार्ष्यायणि, (11.) शाकपूणि, (12.) स्थौलाष्ठीवि । तेरहवें निरुक्तकार स्वयम् आचार्य यास्क हैं । चौदहवाँ निरुक्तकार कौन है, इसका उल्लेख नहीं है ।

वेदार्थ के अनुशीलन के आठ पक्ष---
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(क) अधिदैवत, (ख) अध्यात्म, (ग) आख्यान-समय, (घ) ऐतिहासिकाः, (ङ) नैदानाः, (च) नैरुक्ताः, (छ) परिव्राजकाः, (ज) याज्ञिकाः ।

टीकाकार
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निरुक्त पर अनेक व्याख्याएँ लिखी गईं हैं---

(1.) दूर्गाचार्यः--
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इन्होंने निरुक्त पर एक वृत्ति लिखी थी, जिसे दुर्गवृत्ति कहा जाता है । यह विद्वत्तापूर्ण और प्रामाणिक टीका है । इनके बारे में बहुत अल्प जानकारी मिलती है । ये कापिष्ठल शाखाध्यायी वसिष्ठगोत्री ब्राह्मण थे । अनुमान के आधार पर ये गुजरात अथवा काश्मीर के वासी थे । इस वृत्ति की सबसे प्राचीन हस्तलिखित प्रति 1444 वि.सं. की है ।

(2.) स्कन्द महेश्वरः---
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ये दुर्गाचार्य से प्राचीन टीकाकार हैं । इनकी टीका लाहौर से प्राप्त हुई है । यह टीका अतीव पाण्डित्यपूर्ण है । इन्होंने ऋग्वेद पर एक भाष्य लिखा था । ये गुजरात के वल्लभी के रहने वाले थे ।

(3.) निरुक्त-निचय--इसके रचयिता वररुचि हैं ।

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