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रविवार, 21 अगस्त 2016

वैदिक छन्द---६

!!!---: वैदिक छन्द :---!!!
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भाग--६

छन्दः पद का निर्वचन
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प्राचीन वाङ्मय में "छन्द" पद का अनेका प्रकार का निर्वचन उपलब्ध होता है । यथा---

(१.) सामवेदीय दैवत ब्राह्मण में छन्दः पद का निर्वचन इस प्रकार लिखा है---
"छन्दांसि छन्यतीति वा" (१.३)
अर्थात् छन्दः पद का छन्द (छदि) चौरादिक धातु से निष्पन्न होता है ।

(२.) तैत्तिरीय संहिता (५.६.६.१) में----
"ते छन्दोभिरात्मानं छादयित्वोपार्यस्तच्छन्दसां छन्दस्त्वम् ।"

(३.) शतपथ-ब्राह्मण (८.५.२.१) में---
"यदस्मा अच्छदर्यस्तास्माच्छन्दांसि ।"

(४.) छान्दोग्योपनिषद् (१.४.२) में---
"देवा वै मृत्योर्बिभ्यतस्त्रयीं विद्यां प्राविशँस्ते छन्दोभिरच्छादयन्, यदेभिरच्छादयैस्तच्छन्दसां छन्दस्त्वम् ।"

इन (२--४) उद्धरणों में "छन्दः" पद का निर्वचन "छद" धातु से दर्शाया है ।

(५.) निरुक्त (७.१२) में लिखा है---
"छन्दांसि छादनात् ।"
अर्थात् छन्दः नाम छादन (आच्छादन--ढाँपने) के कारण है ।

(६.) गार्ग्य ने उपनिदान सूत्र में लिखा है---
"यस्माच्छादिता देवाश्छन्दोभिर्मृत्युभीरवः ।
छन्दसां तेन छन्दस्त्वं ख्यायते वेदवादिभिः ।।"

अर्थात् जिस कारण मृत्यु से डरे हुए देवों ने (स्वयं को) छिपाया, इस कारण छन्दों का यही छन्दःपन वेदवादी ऋषियों से प्रकट किया जाता है ।

(७.) उणादि सूत्र में छन्दः पद का साधुत्वनिदर्शक सूत्र इस प्रकार है---
"चन्देरादेश्च छः ।" पञ्चपादी (४.२१९), दशपादी (९.७८)
अर्थात्---चदि (चन्द) धातु से "असि" प्रत्यय होता है और धातु के आदि वर्ण चकार को छकार हो जाता है ।

(८.) जयदेव कृत छन्दःसूत्र का विवृतिकार हर्षट लिखता है---
"चन्दति ह्लादं करोति दीप्यते वा श्रव्यतया इति छन्दः ।"(२.१)
अर्थात्---जो आनन्दित करता है, अथवा सुनने योग्य होने से दीप्त (प्रकाशित) होता है, उसे छन्द कहते हैं ।

इस व्युत्पत्ति में भी "चदि आह्लादने दीप्तौ च" धातु से छन्दः पद की निरुक्ति दर्शायी है ।

(९.) पाणिनीय धातुपाठ की पश्चिमोत्तर शाखा का व्याख्याता क्षीरस्वामी (१२ वीं शती वि.) अमरकोश की व्याख्या में छन्दस् और छन्द पद की व्युत्पत्ति इस प्रकार लिखता है---
(क) "छन्दति छन्दः (छन्दस्) ।" (२.७.२२), (३.३.२३२)
(ख) "छन्दयति आह्लादयते छन्दः, अच" । (३.२.२०)

इन व्युत्पत्तियों में क्षीरस्वामी ने "छन्दस्" की व्युत्पत्ति भौवादिक छन्द (छदि) धातु से, तथा "छन्द" की णिजन्त छन्द (छदि) धातु से दर्शायी है ।

(१०.) सायण धातुवृत्ति में "छन्दः" पद की निष्पत्ति "छदि" धातु से मानता है ।

उपरिनिर्दिष्ट व्युत्पत्तियों के अनुसार "छन्दः" पद निम्न धातुओं से निष्पन्न माना गया है---

(क) छन्द (छदि) भौवादिक
(ख) छन्द (छदि) चौरादिक,
(ग) छद चौरादिक
(घ) चन्द (चदि) भौवादिक,
(ङ) छन्द (अकारान्त) की छन्द (छदि) णिजन्त से ।

अग्रिम लेख "छन्दः पद की मूल प्रवृत्तिः"
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