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बुधवार, 9 नवंबर 2016

छन्दःशास्त्र के पर्याय--८

!!!---: वैदिक छन्द :---!!!
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छन्दःशास्त्र के पर्याय--८
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प्राचीन संस्कृत वाङ्मय में छन्दःशास्त्र के लिए अनेक नामों का व्यवहार उपलब्ध होता हैः----

(१.) छन्दोविचिति,
(२.) छन्दोमान,
(३.) छन्दोभाषा,
(४.) छन्दोविजिनी
(५.) छन्दोविजिति, (छन्दोविजित),
(६.) छन्दोनाम,
(७.) छन्दोव्याख्यान,
(८.) छन्दसांविच्य,
(९.) छन्दसांलक्षण,
(१०.) छन्दःशास्त्र,
(११.) छन्दोSनुशासन,
(१२.) छन्दोविवृति,
(१३.) वृत्त,
(१४.) पिङ्गल ।

अब एक-एक नाम पर विचार करते हैंः---

(१.) छन्दोविचितिः---
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यह छन्दःशास्त्रवाची अति प्रसिद्ध पद पाणिनीय गणपाठ (४.३.७३), चान्द्र गणपाठ (३.१.४५) , जैनेन्द्र गणपाठ (३.३.४७), जैन शाकटाय गणपाठ (३.१.१३६), सरस्वतीकण्ठाभरण (४.३.१८९) तथा गणरत्न महोदधि (५.३.४४) में उपलब्ध होता है । कौटिल्य अर्थशास्त्र (१.३) में भी यह पद छन्दःशास्त्र के लिए प्रयुक्त हुआ है ।

छन्दोविचिति पद का अर्थः---
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जिस ग्रन्थ में छन्दों का विशेष रूप से चयन (संग्रह) हो, वह "छन्दोविचिति" कहाता है ।

छन्दोविचिति संज्ञक ग्रन्थविशेषः---
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छन्दोविचिति नाम के निम्न छन्दो ग्रन्थ संस्कृत वाङ्मय में प्रसिद्ध हैः---

(क) पिङ्गलप्रोक्त छन्दोविचिति,
(ख) पतञ्जलिप्रोक्त छन्दोविचिति,
(ग) जनाश्रयप्रोक्त छन्दोविचिति,
(घ) दण्डीप्रोक्त छन्दोविचिति ।

इन ग्रन्थों के अतिरिक्त भरत-नाट्य शास्त्र का १५ वाँ अध्याय भी छन्दोविचिति कहाता है ।

पालिभाषा के वाङ्मय में भी छन्दोविचिति नाम का एक ग्रन्थ उपलब्ध होता है ।

(२.) छन्दोमानः----
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छन्दःशास्त्रवाची छन्दोमान पद पाणिनीय गणपाठ (४.३.७३),जैनेन्द्र गणपाठ (३.३.४७), जैन शाकटाय गणपाठ (३.१.१३६), सरस्वतीकण्ठाभरण (४.३.१८९) तथा गणरत्न महोदधि (५.३.४४) में उपलब्ध होता है । इन सभी वैयाकरणों ने इस नाम को व्याख्यातव्य ग्रन्थ नामों में पढा है । इसलिए यह पद ग्रन्थवाची है, यह स्पष्ट है । "छन्दोमान" नाम वाला शास्त्र अभी तक हमें नहीं मिला है । इस नाम की "शतमान" आदि मुद्राविशेष नामों से तुलना की जा सकती है ।

छन्दोमान पद का अर्थः---जिस ग्रन्थ में छन्दों के मान (परिमाण) का वर्णन हो, उसे छन्दोमान कहते हैं ।

(३.) छन्दोभाषाः----
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छन्दःशास्त्रवाची "छन्दोभाषा" पद पाणिनीय गणपाठ (४.३.७३), चान्द्र गणपाठ (३.१.४५) , जैनेन्द्र गणपाठ (३.३.४७), जैन शाकटाय गणपाठ (३.१.१३६), सरस्वतीकण्ठाभरण (४.३.१८९) तथा गणरत्न महोदधि (५.३.४४) में उपलब्ध होता है ।

छन्दोभाषा का अर्थः---यह पद छन्दोविचिति के समान स्त्रीलिङ्ग हैं । इसका अभिप्राय है---"छन्दसां भाषा भाषणं कथनं व्याख्यानं वा यत्र ।" अर्थात् जिसमें छन्दों का भाषण (कथन, व्याख्यान) हो ।

छन्दोभाषा का अन्यत्र प्रयोगः---ऋक्प्रातिशाख्य (वर्गद्वयवृत्ति), तैत्तिरीय प्रातिशाख्य (२४.५), याजुष् प्रतिज्ञा-परिशिष्ट (३१.१), चरणव्यूह परिशिष्ट (यजुर्वेद खण्ड) तथा भविष्यत् पुराण में भी उपलब्ध होता है ।

(४.) छन्दोविजिनी----
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यह पद पाणिनीय गणपाठ (४.३.७३) के किन्हीं कोशों में उपलब्ध होता है । इस पद का अर्थ अस्पष्ट है । सम्भव है यह छन्दोविजिति अथवा छन्दोविजिति का भ्रंश हो ।

(५.) छन्दोविजितिःः---
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यह नाम चान्द्र गणपाठ (३.१.४५), सरस्वतीकण्ठाभरण (४.३.१८९), प्रक्रिया कौमुदी तथा गणरत्नमहोदधि (५.३४४) में उपलब्ध होता है ।

छन्दोविजितः---- जैनेन्द्र गणपाठ (३.३.४७), में छन्दोविजित पाठ छपा है । संभव है यहाँ पाठ भ्रंश हुआ हो और मूलपाठ छन्दोविजिति ही हो ।

छन्दोविजिति का अर्थः--जिस ग्रन्थ के द्वारा छन्दों पर विजय (अधिकार) हो सके, वह "छन्दोविजिति" कहाता है ।

(६.) छन्दोनामः----
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इस पद का निर्देश चान्द्र गणपाठ (३.१.४५), गणरत्नमहोदधि (५.३४४) में मिलता है । वर्त्तमान में यह नाम अन्य आचार्यों के मत से पढा है ।

छन्दोनाम का अर्थः----जिस ग्रन्थ में विविध छन्दों के नामों का निर्देश हो, वह "छन्दोनाम" कहाता है ।

यह सम्भावना है कि छन्दोनाम पाठ छन्दोमान का अपभ्रंश हो ।

(७.) छन्दोव्याख्यानः---
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इस पद का निर्देश चान्द्र गणपाठ (३.१.४५), गणरत्नमहोदधि (५.३४४) में मिलता है । वर्धमान ने इस पद का परिगणन अन्य आचार्यों के मतानुसार किया है ।

छन्दोव्याख्यान पद का अर्थ---जिस ग्रन्थ में व्याख्यान (कथन) हो, वह " छन्दोव्याख्यान" है ।

(८.) छन्दसांविच्यः----
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निदानसूत्र और उपनिदानसूत्र के आरम्भ में इस पद प्रयोग उपलब्ध होता है । यथा---

"अथातश्छन्दसां विचयं व्याख्यास्यामः ।" (निदान--१.१.१) और उपनिदान (१.१)

(९.) छन्दसांलक्षणः----
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तैत्तिरीय प्रातिशाख्य के व्याख्याता गार्ग्यगोपाल यज्वा द्वारा उद्धृत भविष्यत् पुराण षडङ्गनिर्देशक श्लोक में इस पद का प्रयोग मिलता है---

"छन्दसां लक्षणं चेति षडङ्गानि विदुर्बुधाः ।" (पृष्ठ---५२९)

इसी का समस्तरूप "छन्दोलक्षण" है ।

(१०.) छन्दःशास्त्रः----
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लोक में आचार्य पिङ्गल की छन्दोविचिति के लिए छन्दःशास्त्र अथवा छन्दःसूत्र पद का प्रयोग प्रायः होता है ।

(११.) छन्दोSनुशासनः----
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जयकीर्ति और हेमचन्द्र के थछन्दःशास्त्रों का छन्दोSनुशासन है ।

(१२.) छन्दोविवृतिः---
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मधुसूदन सरस्वती ने पिङ्गल के छन्दःशास्त्र के लिए छन्दोविवृति पद का प्रयोग किया है ।

(१३.) वृत्तः---
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वृत्त पद "छन्दः" का पर्याय है । जिस प्रकार छन्दः पद के आधार पर इस शास्त्र के "छन्दोविचिति", "छन्दोSनुशासन" आदि अनेक ग्रन्थ लोक में प्रसिद्ध हुए हैं । उसी प्रकार "वृत्त" पद के आधार पर भी "वृत्तरत्नाकर" आदि नाम के अनेक ग्रन्थ रचे गए हैं । पालिवाङ्मय में भी "वृत्त" पद के आधार पर वृत्तोद (बुतोदय) नाम का एक प्रसिद्ध ग्रन्थ उपलब्ध होता है ।

(१४.) पिङ्गलः----
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छन्दःशास्त्रकारों में आचार्य पिङ्गल की अतिप्रसिद्धि के कारण उत्तर काल में "पिङ्गल" शब्द छन्दःशास्त्र का पर्याय बन गया है । प्राकृत आदि के अनेक छन्दःशास्त्र "पिङ्गल" नाम पर ही रचे गए । यथा प्राकृत- पिङ्गल आदि ।

कविसारप्रकरण----पालिवाङ्मय में "कविसारप्रकरण" नाम का भी एक ग्रन्थ उपलब्ध होता है ।

अग्रिम लेख "छन्दःशास्त्र" की प्राचीनता होगा ।
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सोमवार, 10 अक्टूबर 2016

वैदिक छन्द

!!!---: वैदिक छन्द :---!!!
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छन्दः पद की मूल प्रकृति
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गत पोस्ट में छन्द पर चर्चा हुई थी । इसमें छन्दः पद में मूल प्रकृति छन्द (छदि) है , छद या चन्द (चदि) नहीं । छद धातु से छन्दः की निष्पत्ति में धातु की उपधा में नकार का उपजन (आगम) मानना पडता है और चन्द (चदि) के चकार को छकार-आदेश । छन्द (छदि) धातु से निष्पत्ति मानने पर न उपजन की आवश्यकता है, न आदेश की । केवल प्रकृति प्रत्यय के संयोग से "छन्दस्" पद निष्पन्न हो जाता है ।

इस पर कहा जा सकता है कि धातुपाठ में अपठित धातु की कल्पना करने की अपेक्षा पठित धातु में उपजन का विकार मानना अधिक न्यायसंगत है । अपठित नई धातु की कल्पना करने में अधिक गौरव है और वह अप्रामाणिक भी है ।


छन्द (छदि) धातु की सत्ता में प्रमाण
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यह सत्य है कि छन्द (छदि) धातु पाणिनीय धातुपाठ के प्राच्य पाठ और जैन शाकटायन के अतिरिक्त अन्य किसी धातुपाठ में उपलब्ध नहीं होती । पुनरपि अपठित मात्र होने से उसका अपलाप अथवा अप्रामाण्य नहीं हो सकता । छन्द (छदि) धातु के अपठित होने पर भी उसके प्रयोग प्राचीन वाङ्मय में बहुत्र उपलब्ध है ।
यथा----
(१.) ऋग्वेद में छन्द (छदि) धातु के अनेक प्रयोग देखे जाते हैं---
छन्त्सि १.१६३.४
छन्त्सत् १.१३२.६ और १०.३२.३
छन्दयसे ८.५०.५
छन्दयति १०.२७.८
चच्छन्द ७.६.३
छन्दुः १.५५.४



(२.) यास्क ने निघण्टु ३.१४ में तथा कौत्सव्य ने निघण्टु खण्ड ९ में "अर्चतिकर्मा" धातुओं में "छन्दति" पद पढा है ।

(३.) देवराज यज्वा ने ज्वलतिकर्मा धातुओं (निघण्टु १.१९) में "ज्योतते " का पाठान्तर "छन्द्यते" लिखा है ।

(४.) दैवतब्राह्मण के पूर्वनिर्दिष्ट (संख्या १) उद्धरण में "छन्दयति" प्रयोग उपलब्ध होता है ।

(५.) ब्रह्मोक्त याज्ञवल्क्य-संहिता अ. ८, श्लोक ३५१ वें में छन्द धातु का ल्युट् प्रत्ययान्त "छन्दन" पद प्रयुक्त हुआ है ।

(६.) वायुपुराण ६७.६२ का पाठ है ---"तं ब्रह्मा छन्दयामास दैत्यं तुष्टो वरेण तु" ।।

(७.) स्कन्द स्वामी ऋग्वेद १.९२.६ की व्याख्या में "छन्दः" पद का व्याख्यान करता हुआ निघण्टु (२.६) पठित कान्त्यर्थक "छन्त्सत्" पद का निर्देश करके "कामी" अर्थ करता है । इससे प्रतीत होता है कि स्कन्द स्वामी "छन्दः" पद को "छन्त्सत्" आख्यात की मूल प्रकृति "छन्द" से निष्पन्न माना है ।

(८.) काशिकावृत्ति १.३.४७ में "उपच्छन्दन" और "उपच्छन्दयति" पद प्रयुक्त है । जो "छदि" धातु से ही निष्पन्न हो सकते हैं ।

(९.) क्षीरस्वामी धातुपाठ की व्याख्या (क्षीरतरंगिणी) में "छन्द" अथवा "छदि" धातु का पाठ न मानकर भी अमर-टीका २.२२.२ तथा ३.३.२३१ में "छन्दति" तथा २.२.२० में "छन्दयति" पद का प्रयोग करता है । इससे स्पष्ट है कि क्षीर स्वामी धातुपाठ (पश्चिमोत्तर पाठ) में छन्द अथवा छदि धातु का पाठ न होने पर भी इस धातु की स्वतन्त्र सत्ता मानता है ।

(१०.) बंगनिवासी मैत्रेय रक्षित अपने धातु-प्रदीप में "छदि संवरणे" धातु की व्याख्या करता है ।

(११.) जैन आचार्य पाल्यकीर्ति अपने शाकटायन धातुपाठ में "छदि संवरणे" धातु को पढता है ।

(१२.) सायण चुरादिगण में "छद संवरणे" (क्षीरतरङ्गिणी--१०.३७) के स्थान में "छदि संवरणे" पाठ मानता है । तदनुसार णिच् पक्ष में "छन्दयति" और णिच् के अभाव पक्ष में "छन्दति" प्रभृति प्रयोग उपपन्न होते हैं ।

इन प्रमाणों से स्पष्ट है कि किसी समय संस्कृतभाषा में "छन्द" (छदि) धातु का निर्बाध प्रयोग होता था । इसलिए छन्द (छदि) धातु की विद्यमानता में "छन्दः" छन्द छन्दु और छन्दन" प्रभृति पदों की मूल प्रकृति छन्द (छदि) धातु ही मानी जा सकती है, चन्द (चदि) प्रभृति नहीं ।



ब्राह्मण और निरुक्त प्रभृति ग्रन्थों में "छन्दः" पद का निर्वचन "छद" धातु से और उणादिसूत्र में "चन्द" (चदि) धातु से क्यों दर्शाया, इसकी विवेचना अग्रिम पोस्ट में की जाएगी ।

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