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रविवार, 31 जनवरी 2016

कल्प-सूत्र

!!!---: कल्प नामक वेदाङ्ग :---!!!
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कल्प नामक वेदांग का वेदांगों में विशिष्ट स्थान है , क्योंकि ये वेद की प्रत्येक शाखा के अपने-अपने ब्राह्मण और आरण्यक आदि की भाँति ही वेद की प्रत्येक शाखा के के पृथक्-2 कल्पसूत्र है ।

कल्पसूत्र का अर्थः---
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विभिन्न वैदिक शाखाओं के ब्राह्मण-ग्रन्थों में विहित कर्मों का व्यवस्थित वर्णन करने वाला वेदांग कल्प कहा जाता है ब्राह्मणों के याज्ञिक विधानों को कल्प कहा जाता है । विष्णुमित्र ने कल्प का लक्षण दिया है--
"कल्पो वेदविहितानां कर्मणामानुपूर्व्येण कल्पनाशास्त्रम् ।" (ऋग्वेद-प्रातिशाख्य) अर्थात् वेद में विहित कर्मों का क्रमपूर्वक व्यवस्थित कल्पना करने वाला शास्त्र ।

कल्पसूत्र चार प्रकार के होते हैंः---
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(1.) श्रौतसूत्र, (2.) धर्मसूत्र, (3.) गृह्यसूत्र, (4.) शुल्वसूत्र ।

(1.) श्रौतसूत्रः---
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वेदों में मूल रूप में जिन यागों का वर्णन है, उसका श्रौत-सूत्र में विस्तार से वर्णन करना इसका मुख्य उद्देश्य है । इनमें याज्ञिक विधि-विधानों का विस्तृत विवेचन है । वैदिक यागों को श्रौत-याग कहते हैं । ये यज्ञ अनेक पुरोहितों द्वारा किए जाते थे । इन यज्ञों में आहवनीय, गार्हपत्य और दक्षिणाग्नि का प्रयोग किया जाता था । ये कुल 14 याग होते थे, जिनमें सात हविर्याग और सात सोमयाग होते थे ।
हविर्यागः--हविर्यागों में घृत, पायस, दधि, पुरोडाश आदि की आहुतियाँ दी जाती थीं । सात हविर्याग ये हैं--अग्न्याधान, अग्निहोत्र, दर्शपूर्णमास, आग्रहायण, चातुर्मास्य, निरूढपशुबन्ध और सौत्रामणी ।
सोमयाग--इसमें सोमरस देवताओं के लिए समर्पित किया जाता था । सात सोमयाग ये हैं--अग्निष्टोम, अत्यग्निष्टोम, उक्थ्य, षोडशी, वाजपेय, अतिरात्र और आप्तोर्याम ।

उपलब्ध श्रौतसूत्रः---
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(क.) ऋग्वेदः--(1.) आश्वलायन, (2.) शांखायन (कौषीतकि),
(ख) शुक्लयजुर्वेदः--(3.) कात्यायन,
(ग) कृष्णयजुर्वेदः--(4.) बोधायन, (5.) आपस्तम्ब, (6.) हिरण्यकेशी (सत्याषाढ), (7.) भारद्वाज, (8.) वैखानस, (9.) मानव (मैत्रायणीय), (10.) वाराह,
(घ) सामवेदः--(11.) आर्षेय, (12.) लाट्यायन, (13.) द्राह्यायन, (14.) जैमिनीय ।
(ङ) अथर्ववेदः--(15.) वैतान ।

(2.) गृह्यसूत्रः---
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गृह्यसूत्रों का महत्त्व लोकजीवन की दृष्टि से है । इनका सम्बन्ध गृह में होने वाले यज्ञों और संस्कारों से है । ये गृहस्थाश्रम की आचारसंहिता है । इसमें पञ्चमहायज्ञों का वर्णन विस्तार से है--(1.) ब्रह्मयज्ञ (सन्ध्या), (2.) देवयज्ञ (अग्निहोत्र), (3.) पितृयज्ञ, (4.) भूतयज्ञ (बलिवैश्वदेवयज्ञ), (5.) अतिथियज्ञ (नृयज्ञ) ।

मनुष्य जीवन में होने वाले 16 संस्कारों का वर्णन भी इनमें प्राप्त होता है । इनमें गृहनिर्माण की विधि का भी विधान है । गृह्यसूत्र ये हैं---(क) ऋग्वेदः--
(1.) आश्वलायन, (2.) शांखायन,
(ख) शुक्लयजुर्वेदः--(3.) पारस्कर,
(ग) कृष्णयजुर्वेदः---(4.) बोधायन, (5.) मानव, (6.) भारद्वाज, (7.) आपस्तम्ब, (8.) हिरण्यकेशी, (9.) वैखानस, (10.) वाधूल, (11.) काठक, (12.) वाराह
(घ) सामवेदः--(13.) गोभिल, (14.) खादिर, (15.) जैमिनीय,
(ङ) अथर्ववेदः--(16.) कौशिक,,

(3.) धर्मसूत्रः---
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यहाँ "धर्म" से तात्पर्य है--कर्त्तव्य और परम्परा । पूर्वोक्त गृह्यसूत्रों में जिस प्रकार व्यक्ति के घरेलू जीवन और गृह्य संस्कारों का विवेचन है, उसी प्रकार व्यक्ति के सामाजिक जीवन और सामाजिक आचार-व्यवहार का विवेचन धर्मसूत्रों में है । इनमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्णों के कर्त्तव्य-कर्मों के विवेचन के साथ राजाओं के कर्त्तव्य-कर्म भी दिए गए हैं ।

उपलब्ध धर्मसूत्रः--(क) ऋग्वेदः--(1.) वसिष्ठ,
(ख) कृष्णयजुर्वेदः---(2.) आपस्तम्ब, (3.) बोधायन, (4.) हिरण्यकेशी,
(ग) सामवेदः--(5.) गौतम ।

धर्मसूत्रों में गौतम सर्वाधिक प्राचीन है । कुमारिल भट्ट ने इसे सामवेद का धर्मसूत्र माना है । इसमें कुल 28 अध्याय हैं । भट्ट के अनुसार ही वसिष्ठ का सम्बन्ध ऋग्वेद से है । इसके अतिरिक्त अन्य अर्वाचीन धर्मसूत्र भी है--विष्णुधर्मसूत्र, हारीतधर्म सूत्र-यजुर्वेद से सम्बद्ध और शंखधर्मसूत्र--यजुर्वेद से सम्बद्ध परवर्ती रचना ।

(4.) शुल्वसूत्रः---
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"शुल्व" शब्द का अर्थ है---"नापने की रस्सी ।" ये शुल्वसूत्र क्रियात्मक है । इनमें वेदिका और मण्डप आदि के निर्माण के लिए उचित लम्बाई-चौडाई और उनके बनाने की विधि का विवरण है । इस दृष्टि से ज्यामितीय गणित का आविष्कार भारत में हुआ था । आजकल भारतीय राजमिस्त्री शुल्व के लिए सूल (शूल) शब्द का प्रयोग करते हैं । उपलब्ध शुल्वसूत्रः---(क) शुक्लयजुर्वेदः--(1.) कात्यायन,
(ख) कृष्णयजुर्वेदः--(2.) बोधायन, (3.) आपस्तम्ब, (4.) मानव, (5.) मैत्रायणीय, (6.) वाराह, (7.) वाधूल
शुल्वसूत्रों में बोधायन सबसे बडा प्राचीनतम है ।

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शुक्रवार, 29 जनवरी 2016

वेदांग-व्याकरणम्

!!!---: व्याकरण :---!!!
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व्याकरण वेदांग को वेद-पुरुष का मुख कहा जाता है---"मुखं व्याकरणं स्मृतम् ।"
वेदांगों में व्याकरण का मुख्य स्थान है---"प्रधानं च षट्सु-अङ्गेषु व्याकरणम् ।" (महाभाष्य)
व्याकरण के द्वारा वेद और लोक के शब्दों की व्याख्या की जाती है, इसके विना वेद को समझना सरल नहीं है---"व्याक्रियन्ते व्युत्पाद्यन्ते शब्दा अनेनेति व्याकरणम् ।"

सर्वप्रथम व्याकरण की अनुश्रुति वेद में होती है--"चत्वारि शृंगास्त्रयो अस्य पादा द्वे शीर्षे सप्त हस्तासो अस्य ।" (ऋग्वेद-4.58.6)

इस वृषभ रूपी व्याकरण के चार सींग (नाम, आख्यात, उपसर्ग और निपात) हैं । इसके तीन पाद (भूत, वर्त्तमान, भविष्यत्) है । इसके दो सिर (सुप् और तिङ्) हैं । इसके सात हाथ (सात विभक्तियाँ) हैं । यह उरस्, कणअठ और मूर्धा इन तीन स्थानों से बँधा हुआ शब्द करता है । यह बडा देव मनुष्यों में प्रविष्ट हो गया है ।

इसके बाद वैदिक व्याकरण का सर्वप्रथम विवेचन प्रातिशाख्यों में मिलता है । इसके छः विषय है---
(1.) वर्ण-समाम्नाय, (2.) पदविभाग, (3.) सन्धि-विच्छेद, (4.) स्वर-विचार, (5.) पाठ-विचार, (6.) अन्य उच्चारण सम्बन्धी विषयों का विवेचन ।

(अष्टाध्यायी की पूरी जानकारी इस लिंक पर देखें---
https://www.facebook.com/vaidiksanskrit/photos/pb.510066709013675.-2207520000.1454129521./1035216389832035/?type=3&theater)


वैदिक व्याकरण के बाद लौकिक व्याकरण का उदय हुआ । इसके प्रमुख आचार्य है--पाणिनि । इसके व्याकरण का नाम है---अष्टाध्यायी । इसमें कुल आठ अध्याय हैं । सभी में चार-चार पाद है, कुल 32 पाद है । इसमें लगभग 3992 सूत्र है । इसका रचनाकाल 600 ई.पू. माना जाता है । इसके बाद कात्यायन मुनि ने ई.पू. 400 वर्ष में इसके ऊपर वार्तिकों की रचना की, जिसकी संख्या भी चार हजार के आस-पास है । 200 ई.पू. में पतञ्जलि ऋषि ने इन वार्तिकों के ऊपर "महाभाष्य" की रचना की । इन तीनों को मिलाकर "त्रिमुनि-व्याकरणम्" कहा जाता है ।

वामन और जयादित्य ने मिलकर अष्टाध्यायी के ऊपर एक वृत्ति लिखी थी, जिसका नाम है---काशिका । इसके ऊपर जिनेन्द्र बुद्धि ने न्यास नामक एक व्याख्या लिखी थी । हरदत्त मिश्र ने भी इसके ऊपर पदमञ्जरी नामक व्याख्या लिखी थी । महाभाष्य के बाद व्याकरण का दार्शनिक ग्रन्थ भर्तृहरि ने वाक्यपदीयम् नाम से लिखा था । सम्पूर्ण महाभाष्य पर कैयट ने प्रदीप नाम से एक टीका लिखी थी । महाभाष्य पर अन्य अनेक टीकाएँ लिखी गईं । इस प्रदीप पर नागेश भट्ट ने उद्योत नाम से बृहद् व्याख्या लिखी है । बाद में आगे चलकर प्रक्रिया ग्रन्थों की शुरुआत हुई । रामचन्द्र इसके पुरोधा थे। इस क्रम में भट्टोजिदीक्षित रचित सिद्धान्तकौमुदी बहुत प्रसिद्ध है ।

व्याकरण का प्रयोजन--(1.) रक्षा, (2.) ऊह, (3.) आगम, (4.) लघ्वर्थम्, (5.) असन्देहार्थम् । इसके अतिरिक्त 13 अन्य प्रयोजन भी हैं ।

महर्षि शाकटायन ने ऋक्तन्त्र में लिखा है कि व्याकरण का कथन ब्रह्मा ने बृहस्पति से किया, बृहस्पति ने ने इन्द्र से, इन्द्र भरद्वाज से भरद्वाज ने ऋषियों से और ऋषियों ने ब्राह्मणों से किया । इसका उल्लेख तैत्तिरीय-संहिता (6.4.7.3) में भी मिलता है ।

पहले वाणी अव्याकृत थी । देवताओं की प्रार्थना पर सर्वप्रथम इन्द्र ने इसकी व्याख्या की--"बृहस्पतिश्च वक्ता, इन्द्रश्च अध्येता, दिव्यं वर्षसहस्रमध्ययनकालः। अन्तं च न जगाम ।" (महाभाष्य)

इसके बाद महेश (शिव) का व्याकरण भी मिलता है, समुद्र के समान विस्तृत था । बोपदेव ने व्याकरण के आठ सम्प्रदायों का उल्लेख किया है--

"इन्द्रश्चन्द्रः काशकृत्स्नापिशली शाकटायनः ।
पाणिन्यमरजैनेन्द्रा जयन्त्यष्टादिशाब्दिका ।।"

कुछ व्याकरण लुप्त हो गए, जैसे---व्याडि का संग्रह नामक व्याकरण ।

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और विस्तार से पढें---
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शुक्रवार, 22 जनवरी 2016

शिक्षा
वेदांगों में शिक्षा वेदांग का स्थान महत्त्वपूर्ण है । अंगों में शिक्षा को घ्राण (नासिका) कहा गया है :--- "शिक्षा घ्राणं तु वेदस्य ।" आचार्य सायण ने शिक्षा की परिभाषा की है---"स्वरवर्णाद्युच्चारणप्रकारो यत्रोपदिश्यते सा शिक्षा ।" अर्थ---जिस वेदांग में स्वर और वर्ण आदि के उच्चारण की रीति का उपदेश दिया जाता है, वह शिक्षा है ।
शिक्षा वेदांग में मुख्यतः उच्चारण प्रकार ही है । तैत्तिरीयोपनिषद् (1.1) में इसे और भी स्पष्ट किया गया है---"शिक्षां व्याख्यास्यामः--वर्णः, स्वरः, मात्रा, बलम्, साम, सन्तानः--इत्युक्तः शिक्षाध्यायः ।"

शिक्षा ग्रन्थ में इन छः अंगों का विवेचन किया जाता है---
(1.) वर्णः---अ, इ, उ, क्, ख् आदि वर्णों का उच्चारण ।
(2.) स्वरः--वेदपाठ में प्रयुक्त उदात्त, अनुदात्त और स्वरित का उच्चारण ।
(3.) मात्रा---ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत का उच्चारण ।
(4.) बल---स्थान, प्रयत्न के अनुसार वर्णों का उच्चारण ।
(5.) साम---दोषरहित और माधुर्य आदि गुण सहित उच्चारण ।
(6.) सन्तान---संहिता (सन्धि) के नियमों के अनुसार उच्चारण ।

शिक्षा में तीन प्रकार की रचनाएँ---
(1.) प्रातिशाख्य, (2.) शिक्षा-ग्रन्थ (3.) शिक्षा-सूत्र ।

(1.) प्रातिशाख्य-ग्रन्थ :----
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ये सबसे प्राचीान ग्रन्थ हैं । वेद की प्रत्येक संहिता का, शाखा का अपना प्रातिशाख्य-ग्रन्थ हैं । "प्रतिशाखा" से सम्बन्धित होने के कारण ही इन्हें प्रातिशाख्य कहा जाता है । प्रत्येक शाखा में वेदमन्त्रों के उच्चारण के प्रकार भिन्न-भिन्न है ।
प्रातिशाख्य-ग्रन्थों के विषय---
(1.) वर्ण समाम्नाय---स्वर और व्यञ्जन आदि वर्णों की गणना करना और उनके उच्चारण के नियमों को स्पष्ट करना ।
(2.) सन्धि--दो वर्णों के मिलने पर होने वाले परिवर्तनों का विवेचन ।
(3.) प्रगृह्य सञ्ज्ञा---पदों के विभाग के नियमों को स्पष्ट करना तथा अपवाद नियमों को बतलाना ।
(4.) उदात्त-अनुदात्त शब्दों की गणना, स्वरित के भेद बतलाना और आख्यात स्वर को स्पष्ट करना ।
(5.) संहितापाठ और पदपाठ में भेद दिखलाने वाले नियमों की व्याख्या और सत्व, षत्व और दीर्घ का विवरण ।
(6.) विभिन्न प्रातिशाख्य में विभिन्न पाठ ।
(7.) साम-प्रातिशाख्य में विभिन्न रीतियों का वर्णन, जैसे--प्रश्लेष, विश्लेष, कृष्ट, अकृष्ट संकृष्ट आदि उच्चारण में होने वाले भेदों का वर्णन ।

सम्प्रति उपलब्ध प्रातिशाख्य-ग्रन्थः---
(क) ऋग्वेद---(1.) ऋक्प्रातिशाख्य,
(ख) शुक्लयजुर्वेदः--(2.) वाजसनेयिप्रातिशाख्य,
(ग) कृष्णयजुर्वेदः--(3.) तैत्तिरीय-प्रातिशाख्य,
(घ) सामवेद---(4.) पुष्पसूत्र प्रातिशाख्य, (5.) ऋक्तन्त्र प्रातिशाख्य,
(ङ) अथर्ववेद---(6.) अथर्ववेद-प्रातिशाख्य सूत्र, (7.) अथर्व प्रातिशाख्य, (8.) चतुरध्यायिका ।

संहितापाठ और पदपाठ के द्वारा वैदिक संहिताओं के स्वरूप को सुरक्षित रखा गया है ।
प्रातिशाख्य की विषय-सामग्री---(1.) मन्त्रों का उच्चारण, (2.) मन्त्रों में स्वर-विधान, (3.) सन्धि, (4.) आवश्यकतानुसार छन्द के कारण ह्रस्व के स्थान में दीर्घ का विधान, (5.) संहितापाठ को पदपाठ में बदलने के नियम ।
प्रातिशाख्य व्याकरण के आदि ग्रन्थ माने जाते हैं । यद्यपि प्रातिशाख्य स्वयं व्याकरण-ग्रन्थ नहीं है, तथापि इनमें व्याकरण के मूलभूत सिद्धान्त स्थापित है ।

(2.) शिक्षा-ग्रन्थ :---
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प्रातिशाख्य-ग्रन्थों के आधार पर शिक्षा-ग्रन्थों की रचना हुई है । ये कारिकाओं में उपलब्ध है । इनकी संख्या अनिश्चित है । सम्प्रति 11 शिक्षा-ग्रन्थ उपलब्ध हैं--
(1.) पाणिनीय शिक्षा, (2.) याज्ञवल्क्य-शिक्षा, (3.) वाशिष्ठी शिक्षा, (4.) कात्यायनी, (5.) पाराशरी, (6.) माण्डव्यी, (7.) अमोघानन्दिनी, (8.) माध्यन्दिनी, (9.) केशवी, (10.) नारदीया, (11.) माण्डूकी शिक्षा ।
शिक्षा-ग्रन्थों के विषयः--
(1.) शुद्ध-उच्चारण का महत्त्व,
(2.) शुद्ध-उच्चारण के नियम,
(3.) पाठक के गुण,
(4.) पाठक के दोष ।

(3.) शिक्षा-सूत्र :---
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इन शिक्षाओं के अतिरिक्त अन्य प्राचीन शिक्षासूत्र भी उपलब्ध होते हैं, जैसे--आपिशली, पाणिनि और चन्द्रगोमी । शिक्षासूत्रों में वर्णों की उत्पत्ति के स्थान और वर्णों के उच्चारण में होने वाले प्रयत्न आदि पर प्रकाश डाला गया है ।
सृष्टि के आदि में ऋषियों, मनीषियों ने भाषा का बहुत ही सूक्ष्म विवेचन किया था । भारत में भाषाशास्त्र (आधुनिक भाषाविज्ञान) के इतिहास के अध्ययन की दृष्टि से शिक्षा-वेदाङ्ग का बहुत महत्त्व है ।
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सोमवार, 18 जनवरी 2016



!!!---: महर्षि कपिल का जीवन वृत्तान्त :---!!!
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(1.) परिचय :----
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इनके समय और जन्मस्थान के बारे में निश्चय नहीं किया जा सकता। बहुत से विद्वानों को तो इनकी ऐतिहासिकता में ही संदेह है। पुराणों तथा महाभारत में इनका उल्लेख हुआ है। कहा जाता है, प्रत्येक कल्प के आदि में कपिल जन्म लेते हैं। जन्म के साथ ही सारी सिद्धियाँ इनको प्राप्त होती हैं। इसीलिए इनको "आदिसिद्ध" और "आदिविद्वान्‌" कहा जाता है। इनका शिष्य कोई आसुरि नामक वंश में उत्पन्न "वर्षसहस्रयाजी श्रोत्रिय ब्राह्मण" बतलाया गया है।
परंपरा के अनुसार उक्त आसुरि को निर्माणचित्त में अधिष्ठित होकर इन्होंने तत्वज्ञान का उपदेश दिया था। "निर्माणचित्त" का अर्थ होता है सिद्धि के द्वारा अपने चित्त को स्वेच्छा से निर्मित कर लेना। इससे मालूम होता है, कपिल ने आसुरि के सामने साक्षात्‌ उपस्थित होकर उपदेश नहीं दिया, अपितु आसुरि के ज्ञान में इनके प्रतिपादित सिद्धांतों का स्फुरण हुआ, अत: ये 'आसुरि' के गुरु कहलाए। महाभारत में ये सांख्य के वक्ता कहे गए हैं। इनको अग्नि का अवतार और ब्रह्मा का मानसपुत्र भी पुराणों में कहा गया है। श्रीमद्भगवत के अनुसार कपिल विष्णु के पंचम अवतार माने गए हैं। कर्दम और देवहूति से इनकी उत्पत्ति मानी गई है। बाद में इन्होंने अपनी माता देवहूति को सांख्यज्ञान का उपदेश दिया, जिसका विशद वर्णन श्रीमद्भगवत के तीसरे स्कंध में मिलता है।

(2.) स्थान और समय :----
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कपिलवस्तु, जहाँ बुद्ध पैदा हुए थे, कपिल के नाम पर बसा नगर था और सगर के पुत्र ने सागर के किनारे कपिल को देखा और उनका शाप पाया तथा बाद में वहीं गंगा का सागर के साथ संगम हुआ। इससे मालूम होता है कि कपिल का जन्मस्थान संभवत: कपिलवस्तु और तपस्याक्षेत्र गंगासागर था। इससे कम-से-कम इतना तो अवश्य कह सकते हैं कि बुद्ध के पहले कपिल का नाम फैल चुका था। यदि हम कपिल के शिष्य आसुरि का शतपथ ब्राह्मण के आसुरि से अभिन्न मानें तो कह सकते हैं कि कम-से-कम ब्राह्मणकाल में कपिल की स्थिति रही होगी। इस प्रकार 700 वर्ष ई.पू. कपिल का काल माना जा सकता है।

(3.) संक्षिप्त परिचय :----
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• कपिलमुनि के माता का नाम मनुपुत्री देवहूति और पिता का नाम कर्दम ऋषि था ।
• कर्दम मुनि का आश्रम सरस्वती नदी के तट पर बिन्दुसर नामक तीर्थ पर था ।
• कुछ इतिहासकारों के अनुसार कपिल मुनि का का समय आज से लगभग 6000 वर्ष पूर्व है ।
• सांख्य सिद्धान्तों की परम्परा आपने अपने पिता से ही प्राप्त की थी ।
• आपने "षष्टितन्त्र" नामक शास्त्र की रचना की जिसको आगे चलकर "सांख्यदर्शन" भी कहा जाने लगा ।
• आपके सांख्यदर्शन का मुख्य विषय है _-- प्रकृत्ति उसके विकार, विवेकख्याति, आत्मा आदि ।
• आपके इस सिद्धान्त को आधुनिक विज्ञान ने भी मान्यता दी है :-- ( नऽवस्तुनो वस्तुसिद्धिः ) अभाव से भाव नहीं होता ।
• सांख्य परम्परा में आपके आसुरि नामक शिष्य हुए ।
• आसुरि के शिष्य आचार्य पञ्चशिख हुए हैं । जिनके सिद्धान्त भी आपके सांख्यशास्त्र में हैं । राजा जनक की सभा में पञ्चशिखाचार्य की उपस्थिति बताई जाती है ।
• श्रीमद्भग्वदगीता में आपके सांख्यशास्त्र की गहरी छाप है । योगेश्वर कृष्ण भी आपके सांख्य के महाविद्वान् थे ।
• आपने अपने शास्त्र में २५ तत्वों का उल्लेख किया है । जो सृष्टि रचना में सहयोगी होते हैं ।
• आपका सांख्यदर्शन पूर्ण रूप से आस्तिक है । कुछ लोगों ने ईश्वर विषय को इसमें न पाकर आपको नास्तिक मान लिया था ।

(4.) सांख्य-शास्त्र के प्रवक्ता :----
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कपिल प्राचीन भारत के एक प्रभावशाली मुनि थे। इन्हें "सांख्य-शास्त्र" (यानि तत्व पर आधारित ज्ञान) के प्रवर्तक के रूप में जाना जाता है जिसके मान्य अर्थों के अनुसार विश्व का उद्भव विकासवादी प्रक्रिया से हुआ है। कई लोग इन्हें अनीश्वरवादी मानते हैं, लेकिन गीता में इन्हें श्रेष्ठ मुनि कहा गया है। "कपिल ने सर्वप्रथम विकासवाद का प्रतिपादन किया और संसार को एक क्रम के रूप में देखा ।" संसार को स्वाभाविक गति से उत्पन्न मानकर इन्होंने संसार के किसी अति प्राकृतिक कर्ता का निषेध किया। सुख-दु:ख प्रकृति की देन है तथा पुरुष अज्ञान में बद्ध है। अज्ञान का नाश होने पर पुरुष और प्रकृति अपने-अपने स्थान पर स्थित हो जाते हैं। अज्ञानपाश के लिए ज्ञान की आवश्यकता है अत: कर्मकांड निरर्थक है। ज्ञानमार्ग का यह प्रवर्तन भारतीय संस्कृति को कपिल की देन है। यदि बुद्ध, महावीर जैसे नास्तिक दार्शनिक कपिल से प्रभावित हों तो आश्चर्य नहीं। आस्तिक दार्शनिकों में से वेदांत, योग और पौराणिक स्पष्ट रूप में सांख्य के त्रिगुणवाद और विकासवाद को अपनाते हैं। इस प्रकार कपिल प्रवर्तित सांख्य का प्रभाव प्राय: सभी दर्शनों पर पड़ा है।

(5.) कपिल मुनि का उपदेश :----
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कपिल ने क्या उपदेश दिया, इस पर विवाद और शोध होता रहा है। तत्वसमाससूत्र को उसके टीकाकार कपिल द्वारा रचित मानते हैं। सूत्र छोटे और सरल हैं। इसीलिए मैक्समूलर ने उन्हें बहुत प्राचीन बतलाया। 8वीं शताब्दी के जैन ग्रंथ 'भगवदज्जुकीयम्‌' में सांख्य का उल्लेख करते हुए कहा गया है–
"अष्टौ प्रकृतय:, षोडश विकारा:, आत्मा, पंचावयवा:, त्रैगुण्यम्, मन:, संचर:, प्रतिसंचरश्च ।"
(आठ प्रकृतियाँ, सोलह विकार, आत्मा, पाँच अवयव, तीन गुण, मन, सृष्टि और प्रलय) ये सांख्यशास्त्र के विषय हैं।

(6.) काल :----
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'तत्वसमाससूत्र' में भी ऐसा ही पाठ मिलता है। साथ ही तत्वसमाससूत्र के टीकाकार भावागणेश कहते हैं कि उन्होंने टीका लिखते समय पंचशिख लिखित टीका से सहायता ली है। रिचार्ड गार्वे के अनुसार पंचशिख का काल प्रथम शताब्दी का होना चाहिए। अत: "भगवज्जुकीयम्‌" तथा भावागणेश की टीका को यदि प्रमाण मानें तो 'तत्वसमाससूत्र' का काल ईसा की पहली शताब्दी तक ले जाया जा सकता है। इसके पूर्व इसकी स्थिति के लिए सबल प्रमाण का अभाव है। सांख्यप्रवचनसूत्र को भी कुछ टीकाकार कपिल की कृति मानते हैं। कौमुदीप्रभा के कर्ता स्वप्नेश्वर 'सांख्यप्रवचनसूत्र' को पंचशिख की कृति मानते हैं और कहते हैं कि यह ग्रंथ कपिल द्वारा निर्मित इसलिए माना गया है कि कपिल सांख्य के प्रवर्तक हैं। यही बात 'तत्वसमास' के बारे में भी कही जा सकती है। परंतु सांख्यप्रवचनसूत्र का विवरण माधव के 'सर्वदर्शनसंग्रह' में नहीं है और न तो गुणरत्न में ही इसके आधार पर सांख्य का विवरण दिया है। अत: विद्वान्‌ लोग इसे 14वीं शताब्दी का ग्रंथ मानते हैं। लेकिन गीता (१०.२६) में इनका ज़िक्र आने से ये और प्राचीन लगते हैं।

(7.) सांख्य का विषय :----
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सांख्य में प्रकृति और पुरुष ये दो तत्व माने गए हैं। प्रकृति को सत्व, रजस्‌ और तमस्‌ इन तीन गुणों से निर्मित कहा गया है। त्रिगुण की साम्यावस्था, प्रकृति और इनके वैषम्य से सृष्टि होती है। सृष्टि में कुछ नया नहीं है, सब प्रकृति से ही उत्पन्न है। संसार प्रकृति का परिणाम मात्र है। सत्कार्यवाद और परिणामवाद के प्रवर्तक के रूप में सांख्य की प्रसिद्धि है। पुरुष के सन्निधि मात्र से प्रकृति में वैषम्य होने से सृष्टि होती है।
प्रकृति जड़ है-पुरुष चेतन, प्रकृति कर्ता है-पुरुष निष्क्रिय। लँगड़े और अंधे के संयोग की तरह पुरुष और प्रकृति का संयोग है। पुरुष चेतन है और अपना बिंब प्रकृति में देखकर अपने को ही कर्ता समझता है और इसी अज्ञान के बंधन में पड़कर दु:ख भोगता है, मोह को प्राप्त होता है। जिस समय पुरुष को ज्ञान हो जाता है कि वह कर्ता नहीं है, निर्लिप्त, कूटस्थ साक्षी मात्र है, प्रकृति का नाट्य उसके लिए समाप्त हो जाता है। अज्ञानजन्य कर्मबंध से मुक्त होकर अपने केवल रूप को जान लेना :कैवल्य" या "मोक्ष" है और यही "परम पुरुषार्थ" है। मुक्त होने पर मुक्त पुरुष के लिए प्रकृति महत्वहीन है परंतु अन्य संसारी पुरुष के लिए वह सत्य है क्योंकि प्रकृति का नाश नहीं होता। यही कारण है कि सांख्य में नाना पुरुष माने गए हैं।

पुराणों तथा 'सांख्यप्रवचनसूत्र' के अनुसार पुरुषों के ऊपर एक पुरुषोत्तम भी माना गया है। यह पुरुषोत्तम या ईश्वर पुरुष को मोक्ष देता है। परंतु प्राचीनतम उपलब्ध सांख्य ग्रंथ 'सांख्यकारिका' के अनुसार ईश्वर को सांख्य में स्थान नहीं है। स्पष्टत: कपिल भी निरीश्वरवादी थे, सेश्वर सांख्य (ईश्वरवादी सांख्य) का विकास बाद में हुआ।

सांख्य में पचीस तत्व माने गए हैं। पुरुष, पुरुष की संनिधियुक्त प्रकृति से महत्‌ या बुद्धि, बुद्धि से अहंकार, अहंकार से पाँच तन्मात्राएँ अथवा सूक्ष्म भूत और मन, पाँच तन्मात्राओं से पाँच ज्ञानेंद्रियाँ, पाँच कर्मेद्रियाँ और पाँच स्थूलभूत उत्पन्न होते हैं। इनमें से प्रकृति किसी से उत्पन्न नहीं है, महत्‌ अहंकार और तन्मात्राएँ, ये सात प्रकृति से उत्पन्न हैं और दूसरे तत्वों को उत्पन्न भी करते हैं। बाकी सोलह तत्व केवल उत्पन्न हैं, किसी नए तत्व को जन्म नहीं देते। अत: ये सोलह विकार माने जाते हैं, प्रकृति अविकारी है, महत्‌ आदि सात तत्व स्वयं विकारी हैं और विकार उत्पन्न भी करते हैं।

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