व्याकरण वेदांग को वेद-पुरुष का मुख कहा जाता है---"मुखं व्याकरणं स्मृतम् ।"
वेदांगों में व्याकरण का मुख्य स्थान है---"प्रधानं च षट्सु-अङ्गेषु व्याकरणम् ।" (महाभाष्य)
व्याकरण के द्वारा वेद और लोक के शब्दों की व्याख्या की जाती है, इसके विना वेद को समझना सरल नहीं है---"व्याक्रियन्ते व्युत्पाद्यन्ते शब्दा अनेनेति व्याकरणम् ।"
सर्वप्रथम व्याकरण की अनुश्रुति वेद में होती है--"चत्वारि शृंगास्त्रयो अस्य पादा द्वे शीर्षे सप्त हस्तासो अस्य ।" (ऋग्वेद-4.58.6)
इस वृषभ रूपी व्याकरण के चार सींग (नाम, आख्यात, उपसर्ग और निपात) हैं । इसके तीन पाद (भूत, वर्त्तमान, भविष्यत्) है । इसके दो सिर (सुप् और तिङ्) हैं । इसके सात हाथ (सात विभक्तियाँ) हैं । यह उरस्, कणअठ और मूर्धा इन तीन स्थानों से बँधा हुआ शब्द करता है । यह बडा देव मनुष्यों में प्रविष्ट हो गया है ।
इसके बाद वैदिक व्याकरण का सर्वप्रथम विवेचन प्रातिशाख्यों में मिलता है । इसके छः विषय है---
(1.) वर्ण-समाम्नाय, (2.) पदविभाग, (3.) सन्धि-विच्छेद, (4.) स्वर-विचार, (5.) पाठ-विचार, (6.) अन्य उच्चारण सम्बन्धी विषयों का विवेचन ।
(अष्टाध्यायी की पूरी जानकारी इस लिंक पर देखें---
https://www.facebook.com/vaidiksanskrit/photos/pb.510066709013675.-2207520000.1454129521./1035216389832035/?type=3&theater)
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वैदिक व्याकरण के बाद लौकिक व्याकरण का उदय हुआ । इसके प्रमुख आचार्य है--पाणिनि । इसके व्याकरण का नाम है---अष्टाध्यायी । इसमें कुल आठ अध्याय हैं । सभी में चार-चार पाद है, कुल 32 पाद है । इसमें लगभग 3992 सूत्र है । इसका रचनाकाल 600 ई.पू. माना जाता है । इसके बाद कात्यायन मुनि ने ई.पू. 400 वर्ष में इसके ऊपर वार्तिकों की रचना की, जिसकी संख्या भी चार हजार के आस-पास है । 200 ई.पू. में पतञ्जलि ऋषि ने इन वार्तिकों के ऊपर "महाभाष्य" की रचना की । इन तीनों को मिलाकर "त्रिमुनि-व्याकरणम्" कहा जाता है ।
वामन और जयादित्य ने मिलकर अष्टाध्यायी के ऊपर एक वृत्ति लिखी थी, जिसका नाम है---काशिका । इसके ऊपर जिनेन्द्र बुद्धि ने न्यास नामक एक व्याख्या लिखी थी । हरदत्त मिश्र ने भी इसके ऊपर पदमञ्जरी नामक व्याख्या लिखी थी । महाभाष्य के बाद व्याकरण का दार्शनिक ग्रन्थ भर्तृहरि ने वाक्यपदीयम् नाम से लिखा था । सम्पूर्ण महाभाष्य पर कैयट ने प्रदीप नाम से एक टीका लिखी थी । महाभाष्य पर अन्य अनेक टीकाएँ लिखी गईं । इस प्रदीप पर नागेश भट्ट ने उद्योत नाम से बृहद् व्याख्या लिखी है । बाद में आगे चलकर प्रक्रिया ग्रन्थों की शुरुआत हुई । रामचन्द्र इसके पुरोधा थे। इस क्रम में भट्टोजिदीक्षित रचित सिद्धान्तकौमुदी बहुत प्रसिद्ध है ।
व्याकरण का प्रयोजन--(1.) रक्षा, (2.) ऊह, (3.) आगम, (4.) लघ्वर्थम्, (5.) असन्देहार्थम् । इसके अतिरिक्त 13 अन्य प्रयोजन भी हैं ।
महर्षि शाकटायन ने ऋक्तन्त्र में लिखा है कि व्याकरण का कथन ब्रह्मा ने बृहस्पति से किया, बृहस्पति ने ने इन्द्र से, इन्द्र भरद्वाज से भरद्वाज ने ऋषियों से और ऋषियों ने ब्राह्मणों से किया । इसका उल्लेख तैत्तिरीय-संहिता (6.4.7.3) में भी मिलता है ।
पहले वाणी अव्याकृत थी । देवताओं की प्रार्थना पर सर्वप्रथम इन्द्र ने इसकी व्याख्या की--"बृहस्पतिश्च वक्ता, इन्द्रश्च अध्येता, दिव्यं वर्षसहस्रमध्ययनकालः। अन्तं च न जगाम ।" (महाभाष्य)
इसके बाद महेश (शिव) का व्याकरण भी मिलता है, समुद्र के समान विस्तृत था । बोपदेव ने व्याकरण के आठ सम्प्रदायों का उल्लेख किया है--
"इन्द्रश्चन्द्रः काशकृत्स्नापिशली शाकटायनः ।
पाणिन्यमरजैनेन्द्रा जयन्त्यष्टादिशाब्दिका ।।"
पाणिन्यमरजैनेन्द्रा जयन्त्यष्टादिशाब्दिका ।।"
कुछ व्याकरण लुप्त हो गए, जैसे---व्याडि का संग्रह नामक व्याकरण ।
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