लौकिक वाङ्मय में छन्दः---
छन्द पद के कई अर्थ है---
(1.) "छन्दः पद्ये अभिलाषे च ।" अमरकोष--3.3.232
(2.) "गायत्री प्रमुखं छन्दः ।" अमरकोष 2.7.22
(3.) "इच्छासंहितयोरार्षे छन्दो वेदे च छन्दसि ।।" काशिका--1.2.36
(4.) "गायत्रीप्रभृतिच्छन्दो वेदच्छयोरपि ।" शाश्वत--402
(5.) "छन्दः पद्येच्छयोः श्रुतौ । हैम, अनेकार्थ 583
(6.) "छन्दः पद्ये च वेदे च स्वैराद्याचाराभिलाषयोः ।" मेदिनी 22
इन वचनों के अनुसार "छन्दः" पद निम्न अर्थों में प्रयुक्त होता हैः---
(1.) गायत्री आदि पद्य,
(2.) वेद,
(3.) आर्ष (ऋषिप्रोक्त ग्रन्थ)
(4.) संहिता (सन्धि)
(5.) इच्छा (अभिलाषा)
(6.) स्वैर (अनियन्त्रित आचार)
(2.) वेद,
(3.) आर्ष (ऋषिप्रोक्त ग्रन्थ)
(4.) संहिता (सन्धि)
(5.) इच्छा (अभिलाषा)
(6.) स्वैर (अनियन्त्रित आचार)
इस प्रकार छन्दः पद वैदिक और लौकिक वाङ्मय में अनेक अर्थों में प्रयोग होता है । यहाँ पर छन्दः पद का क्या अर्थ होना चाहिए । आइए देखते हैं---
यहाँ पर छन्दः पद का अर्थ गायत्री आदि निबद्ध पद्य-गद्य रचनाविशेष ही अभिप्रेत है ।
एक भ्रान्ति----
कुछ विद्वान् छन्दः पद का अर्थ केवल पद्य मानते हैं । लोक में भी प्रायः करके छन्द पद पद्य अर्थ में ही प्रसिद्ध है । इसी कारण अनेक आचार्य "यजुर्वेद" मन्त्रों को छन्द नहीं मानते हैं ।
जैसे---
(1.) "यजुषामनियताक्षरत्वाद् एकेषां छन्दो न विद्यते ।" (शुक्लयजुः सर्वानुक्रमणी)
(1.) "यजुषामनियताक्षरत्वाद् एकेषां छन्दो न विद्यते ।" (शुक्लयजुः सर्वानुक्रमणी)
(2.) "यजुषां च विशेषविहितं छन्दो न दृश्यते क्वचित् ।" (गुणविष्णु छान्दोग्य मन्त्रब्राह्मण-भाष्य)
(3.) "यजुर्मन्त्राणां त्वपरिमिताक्षरोपेतत्वाच्छन्दोविभागो नास्ति ।" (सायण, छान्दोग्य मन्त्रब्राह्मण-भाष्य)
वस्तुतः प्राचीन आचार्यों के अनुसार छन्द गद्य और पद्य दोनों में होता है । जैसेः--
(क) आचार्य दुर्ग निरुक्त 7.2 की वृत्ति में किसी लुप्त ब्राह्मण का वचन उद्धृत करते हैं---
"नाच्छन्दसि वागुच्चरति इति ।"
अर्थः---छन्द के बिना वाक् उच्चरित नहीं होती है ।
अर्थः---छन्द के बिना वाक् उच्चरित नहीं होती है ।
(ख) भरत मुनि ने नाट्यशास्त्र में लिखा है---
"छन्दो हीनो न शब्दोस्ति , न छन्दः शब्दवर्जितम् ।" (14.45)
अर्थः---छन्द से रहित कोई शब्द नहीं और शब्द से रहित कोई छन्द नहीं ।
अर्थः---छन्द से रहित कोई शब्द नहीं और शब्द से रहित कोई छन्द नहीं ।
(ग) कात्यायन मुनि के नाम से प्रसिद्ध "ऋग्यजुष परिशिष्ट" में लिखा है--
"छन्दोभूतमिदं सर्वं वाङ्मयं स्याद् विजानतः ।
नाच्छन्दसि न चापृष्टे शब्दश्चरति कश्चन ।।"
नाच्छन्दसि न चापृष्टे शब्दश्चरति कश्चन ।।"
अर्थः----ज्ञानी पुरुष के लिए सारा वाङ्मय छन्दोरूप है । क्योंकि छन्द और पृच्छा (जानने की इच्छा) के विना कोई शब्द प्रवृत्त नहीं होता ।
(घ) जयकीर्ति अपने छन्दोनुशासन में लिखता है---
"छन्दोभाग्वाङ्मयं सर्वं न किञ्चिच्छन्दसां विना ।" (1.2)
अर्थः---सम्पूर्ण वाङ्मय छन्द से युक्त है , छन्द के विना कुछ नहीं ।
क्रमशः.....
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