छान्दोग्योपनिषद् की एक प्रसिद्ध कथा पढिए ।
ग्यारह वर्षीय श्वेतकेतु पुत्र को बुलाकर ऋषि आरुणि ने कहा, "पुत्र आचार्य जी के पास पढने के लिए जाओ । हमारे कुल में आज तक कोई मूर्ख नहीं रहा ।" पुत्र श्वेतकेतु अध्ययन के लिए गुरुकुल गए और 24 वर्ष तक सभी वेदादि शास्त्रों को पढकर वापस घर आए । उसका मानना था कि उसने सभी विद्यायाएँ पढ ली है, उसका विद्या पर अधिकार है । इसलिए वह "सर्वश्रेष्ठ" है । पिता श्वेतकेतु ने देखा कि विद्या से विनम्रता आती है, जबकि आरुण तो अहंकारी हो गया है ।
उन्होंने सोचा कि इसे सबक सिखाना आवश्यक है, अन्यथा यह अनर्थ कर सकता है और अहंकार तो किसी चीज का ठीक नहीं होता ।
पिता ने कहा, "पुत्र, क्या तूने वह विद्या पढी है, जिसके पढ लेने से सब कुछ जान लिया जाता है ।"
पुत्र न अनभिज्ञता प्रकट करते हुए कहा, "पिताजी, आज तक मैंने ऐसी विद्या पढी नहीं । यदि ऐसी विद्या होती तो मेरे आचार्य मुझे अवश्य पढाते ।"
पिता ने कहा, "जानना चाहते हो ।"
पुत्र ने हामी भरी ।
पिता ने कहा, "देखो, सामने एक पीपल का वृक्ष है । उसका एक फल तोडकर ले आओ ।"
पुत्र एक फल तोडकर ले आया ।
पिता ने कहा, "इसे तोडो ।"
पुत्र ने उस फल के दो टुकडे कर दिए ।
पिता ने पूछा, "क्या देखते हो ।"
पुत्र ने कहा, "बीज"
पिता ने कहा, "अब एक बीज हाथ में लेकर तोडो ।"
पुत्र ने तोड दिया ।
पिता ने पूछा, "क्या देखते हो ।"
पुत्र ने कहा, "कुछ भी नहीं ।"
पिता ने कहा, "जो तुम्हे कुछ नहीं दीखता है, उसी में एक महान् विशाल वृक्ष बैठा हुआ है । पुत्र, विश्वास करो, कि इस नन्हें से बीज से ही इतना विशाल वृक्ष बनता है । यह दीखता नहीं, किन्तु है और बहुत विशाल है ।"
दूध में घी कहीं नहीं दीखता, किन्तु यदि उसे गरम कर दिया जाए, विलो दिया जाए, तो मक्खन दिखेगा और उसे गरम कर दिया जाए, तो घी अलग हो जाएगा ।
यदि दूध में घी नहीं दीखता तो इसका अभिप्राय यह नहीं है कि उसमें घी नहीं है ।
पिता ने कहा, "पुत्र एक मिट्टी के पात्र में नमक घोल दो । अब बताओ कि नमक दीखता है ।"
पुत्र ने कहा, "नहीं ।"
पिता ने कहा, "नमक कहाँ गया ।"
फिर पिता ने कहा कि इस जल का आचमन करो ।"
पुत्र ने आचमन किया और बताया कि यह जल नमकीन है ।
पिता बोले, "जिस तरह नमक पूरी तरह से जल में घुल गया और सारे जल में मिल गया । उसी तरह हर पदार्थ में वह "सत्" तत्त्व व्यापक है । उस तत्त्व को जानने का प्रयत्न करो ।"
जिस तरह एक सूक्ष्म बीज में वट जैसे वृक्ष विद्यमान है, उसी तरह परमात्मा भी सर्वत्र विद्यमान है । आरुणि विश्वास करो कि वही तत्त्व है, वही सत् है, वही तुम हो "तत्त्वमसि"
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