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मंगलवार, 7 जुलाई 2020

आत्मा की छाया प्राण

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"आत्मन एव प्राणो जायते । यथैषा पुरुषे छायैतस्मिन्नेतदाततं मनोकृतेनायत्यस्मिञ्छरीरे ।।"


आत्मनः --- आत्मा से
एषः --- यह
प्राणः --- प्राण
जायते--- उत्पन्न होता है,
यथा--जैसे
पुरुषे --- पुरुष में
(के साथ रहने वाली)
छाया---- छाया
एतस्मिन् --- इस (आत्मा) में 
एतत् --- यह (प्राण तत्व)
आततम्--- फैला, साथ लगा
मनोकृतेन ---मन द्वारा (मन की प्रेरणा से) किए हुए कर्म से,
आयाति --- आता है,
अस्मिन् ---इस
शरीरे --- शरीर में


आत्मा से प्राण की उत्पत्ति होती है । जैसे पुरुष के साथ छाया लगी है, इसी प्रकार आत्मा के साथ प्राण लगा है ।पुरुष से छाया की उत्पत्ति है । आत्मा से प्राण की उत्पत्ति है । मन के किए से वह इस शरीर में आता है । मन की वासनाएं रस्सी बनकर आत्मा को शरीर में खींच लाती है ।आत्मा शरीर में आया नहीं कि प्राण चलने लगा ।


वस्तुतः मन ही बंधन और मोक्ष का कारण है । यदि मन संसार में लग जाता है तो व्यक्ति बंधन में फंसता है और यदि मन परमात्मा में लग जाता है, अध्यात्म में लग जाता है, धर्म में लग जाता है तो व्यक्ति मुक्ति को प्राप्त करता है ।  इसीलिए संस्कृत में एक कहावत है :---

"मन एव कारणं बन्धनमोक्षयोः" 

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