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सोमवार, 29 जून 2020

ज्ञानेंद्रियों का कर्म


ज्ञान प्राप्ति के साधन हैं :--- आंखें, कान, नाक, रसना और त्वचा । इनमें प्रमुख है :--- आंख और कान । आंखों और कानों से हम बाहरी वस्तुओं का ज्ञान प्राप्त करते हैं । इस ज्ञान प्राप्ति की प्रक्रिया इस प्रकार है :---

"आत्ममनसोः संयोगविशेषात्संकाराच्च स्मृतिः ।।"

जब आंख और कान (अथवा अन्य 3 ज्ञानेंद्रियां) किसी पदार्थ के साथ संबद्ध होते हैं तो उस इंद्रिय के साथ मन का संयोग होता है और मन के साथ आत्मा का----- इस क्रमबद्ध प्रक्रिया से संस्कार बनते हैं और संस्कारों से स्मृति का निर्माण होता है । स्मृति के पीछे संस्कार संस्कारों के पीछे आत्मा और आत्मा के पीछे मन और मन के साथ इंद्रिय संयोग और इंद्रिय के साथ पदार्थ का संयोग यह एक क्रम है । 

इसे इस तरह से समझना चाहिए कि कहीं जाते हुए आपने जलेबी देखी । सुन्दर जलेबी देखकर मीठी-मीठी गन्ध नाक से सुंघकर अपनी प्रतिक्रिया की । आंख, नाक और रसना ने खाने की इच्छा व्यक्त की । उन सब ने अपनी इच्छा मन से प्रकट की । मन ने अपनी इच्छा बुद्धि के पास प्रस्तुत की । बुद्धि ने उचित अनुचित परामर्श करके आत्मा के पास वही इच्छा भेज दी ।  बुद्धि का काम है , निर्णय करना कि इसे खाया जाए या नहीं खाया जाए । वह अपना निर्णय आत्मा को भेजती है । यदि आत्मा कमजोर है इंद्रियों का गुलाम है तो वह बात मान लेगा और यदि वह स्वतंत्र है तो उस पर शत-शत विचार करके उचित निर्णय लेगा । 

इस प्रक्रिया में प्रतिदिन उसी प्रकार से कार्य करने से संस्कार बनते हैं ।

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