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रविवार, 19 जून 2016

नासादीय सूक्त

!!!---: नासादीय सूक्त :---!!!
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नासदीय सूक्त ऋग्वेद के 10 वें मंडल का 129 वाँ सूक्त है। इसका सम्बन्ध ब्रह्माण्ड विज्ञान और ब्रह्मांड की उत्पत्ति के साथ है। माना जाता है कि यह सूक्त ब्रह्माण्ड के निर्माण के बारे में काफी सटीक तथ्य बताता है। इसी कारण दुनिया में काफी प्रसिद्ध हुआ है। नासदीय सूक्त के ऋषि प्रजापति परमेष्ठी हैं। इस सूक्त के देवता भाववृत्त है। यह सूक्त मुख्य रूप से इस तथ्य पर आधारित है कि ब्रह्मांड की रचना कैसे हुई होगी ?


ब्रह्माण्ड विज्ञान
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हमारे सम्मुख दो प्रकार के जगत् हैं- सूक्ष्म ब्रह्माण्ड और बृहत ब्रह्माण्ड; जिसे हम अन्तर्जगत (Microcosm) और बाह्य-जगत् (Macrocosm) कहते हैं। हम अनभूति के द्वारा ही दोनों से सत्य प्राप्त करते हैं। जो सत्य हमें आन्तरिक अनुभव के द्वारा प्राप्त होते हैं, उन्हें मनोविज्ञान (Psychology) या आत्मतत्वज्ञान (Metaphysics) और धर्म कहा जाता है। बाह्य अनुभव से भौतिक विज्ञान (शरीरविज्ञान या फिजियोलॉजी) प्राप्त होते हैं। अतः किसी पूर्ण सत्य का इन दोनों जगतों के अनुभव के साथ अविरोध (harmony) होना चाहिये। सूक्ष्म ब्रह्माण्ड बृहत ब्रह्माण्ड का साक्ष्य (testimony) प्रदान करेगा, बृहत ब्रह्माण्ड सूक्ष्म ब्रह्माण्ड का। भौतिक सत्य का प्रतिरूप अन्तर्जगत में, और अन्तर्जगत के सत्य का प्रमाण भी बहिर्जगत में मिलना चाहिये। तथापि इन सब सत्यों का अधिकांश सर्वदा परस्पर विरोधी पाया जाता है। विश्व-इतिहास के एक काल में 'अन्तर्वादी' प्रधान हो उठे; और उन्होंने 'बहिर्वादियों' के साथ विवाद आरम्भ किया। वर्तमान काल में 'बहिर्वादी' अर्थात भौतिक वैज्ञानिकों ने प्रधानता प्राप्त की है, और उन्होंने मनोवैज्ञानिकों और दार्शनिकों के अनेक सिद्धांतों को उड़ा दिया है।

सृष्टि-उत्पत्ति सूक्त
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नासदासीन्नो सदासात्तदानीं नासीद्रजो नोव्योमा परोयत्।
किमावरीवः कुहकस्य शर्मन्नंभः किमासीद् गहनंगभीरम् ॥1॥

अर्थ- उस समय अर्थात् सृष्टि की उत्पत्ति से पहले प्रलय दशा में असत् अर्थात् अभावात्मक तत्त्व नहीं था। सत्= भाव तत्त्व भी नहीं था, रजः=स्वर्गलोक मृत्युलोक और पाताल लोक नहीं थे, अन्तरिक्ष नहीं था और उससे परे जो कुछ है वह भी नहीं था, वह आवरण करने वाला तत्त्व कहाँ था और किसके संरक्षण में था। उस समय गहन= कठिनाई से प्रवेश करने योग्य गहरा क्या था, अर्थात् वे सब नहीं थे।

न मृत्युरासीदमृतं न तर्हि न रात्र्या अह्न आसीत्प्रकेतः।
अनीद वातं स्वधया तदेकं तस्मादधान्यन्न पर किं च नास ॥2॥

अर्थ– उस प्रलय कालिक समय में मृत्यु नहीं थी और अमृत = मृत्यु का अभाव भी नहीं था। रात्री और दिन का ज्ञान भी नहीं था उस समय वह ब्रह्म तत्व ही केवल प्राण युक्त, क्रिया से शून्य और माया के साथ जुड़ा हुआ एक रूप में विद्यमान था, उस माया सहित ब्रह्म से कुछ भी नहीं था और उस से परे भी कुछ नहीं था।

तम आसीत्तमसा गूढमग्रेऽप्रकेतं सलिलं सर्वमा इदं।
तुच्छ्येनाभ्वपिहितं यदासीत्तपसस्तन्महिना जायतैकं॥3॥

अर्थ- सृष्टिके उत्पन्नहोनेसे पहले अर्थात् प्रलय अवस्था में यह जगत् अन्धकार से आच्छादित था और यह जगत् तमस रूप मूल कारण में विद्यमान था, आज्ञायमान यह सम्पूर्ण जगत् सलिल=जल रूप में था। अर्थात् उस समय कार्य और कारण दोंनों मिले हुए थे यह जगत् है वह व्यापक एवं निम्न स्तरीय अभाव रूप अज्ञान से आच्छादित था इसीलिए कारण के साथ कार्य एकरूप होकर यह जगत् ईश्वर के संकल्प और तप की महिमा से उत्पन्न हुआ।

कामस्तदग्रे समवर्तताधि मनसो रेतः प्रथमं यदासीत्।
सतो बन्धुमसति निरविन्दन्हृदि प्रतीष्या कवयो मनीषा ॥4॥

अर्थ- सृष्टि की उत्पत्ति होने के समय सब से पहले काम=अर्थात् सृष्टि रचना करने की इच्छा शक्ति उत्पन्न हुयी, जो परमेश्वर के मन मे सबसे पहला बीज रूप कारण हुआ; भौतिक रूप से विद्यमान जगत् के बन्धन-कामरूप कारण को क्रान्तदर्शी ऋषियो ने अपने ज्ञान द्वारा भाव से विलक्षण अभाव मे खोज डाला।

तिरश्चीनो विततो रश्मिरेषामधः स्विदासी3दुपरि स्विदासी3त्।
रेतोधा आसन्महिमान आसन्त्स्वधा अवस्तात्प्रयतिः परस्तात् ॥5॥

अर्थ- पूर्वोक्त मन्त्रों में नासदासीत् कामस्तदग्रे मनसारेतः में अविद्या, काम-सङ्कल्प और सृष्टि बीज-कारण को सूर्य-किरणों के समान बहुत व्यापकता उनमें विद्यमान थी। यह सबसे पहले तिरछा था या मध्य में या अन्त में? क्या वह तत्त्व नीचे विद्यमान था या ऊपर विद्यमान था? वह सर्वत्र समान भाव से भाव उत्पन्न था इस प्रकार इस उत्पन्न जगत् में कुछ पदार्थ बीज रूप कर्म को धारण करने वाले जीव रूप में थे और कुछ तत्त्व आकाशादि महान रूप में प्रकृति रूप थे; स्वधा=भोग्य पदार्थ निम्नस्तर के होते हैं और भोक्ता पदार्थ उत्कृष्टता से परिपूर्ण होते हैं।

को अद्धा वेद क इह प्र वोचत्कुत आजाता कुत इयं विसृष्टिः।
अर्वाग्देवा अस्य विसर्जनेनाथा को वेद यत आबभूव ॥6॥

अर्थ- कौन इस बात को वास्तविक रूप से जानता है और कौन इस लोक में सृष्टि के उत्पन्न होने के विवरण को बता सकता है कि यह विविध प्रकार की सृष्टि किस उपादान कारण से और किस निमित्त कारण से सब ओर से उत्पन्न हुयी। देवता भी इस विविध प्रकार की सृष्टि उत्पन्न होने से बाद के हैं अतः ये देवगण भी अपने से पहले की बात के विषय में नहीं बता सकते इसलिए कौन मनुष्य जानता है जिस कारण यह सारा संसार उत्पन्न हुआ।

इयं विसृष्टिर्यत आबभूव यदि वा दधे यदि वा न।
यो अस्याध्यक्षः परमे व्योमन्त्सो अङ्ग वेद यदि वा न वेद ॥7॥




अर्थ- यह विविध प्रकार की सृष्टि जिस प्रकार के उपादान और निमित्त कारण से उत्पन्न हुयी इस का मुख्या कारण है ईश्वर के द्वारा इसे धारण करना। इसके अतिरिक्त अन्य कोई धारण नहीं कर सकता। इस सृष्टि का जो स्वामी ईश्वर है, अपने प्रकाश या आनंद स्वरुप में प्रतिष्ठित है। हे प्रिय श्रोताओं ! वह आनंद स्वरुप परमात्मा ही इस विषय को जानता है उस के अतिरिक्त (इस सृष्टि उत्पत्ति तत्व को) कोई नहीं जानता है।
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मंगलवार, 3 मई 2016

वैदिक छन्द

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लौकिक वाङ्मय में छन्दः---
छन्द पद के कई अर्थ है---
(1.) "छन्दः पद्ये अभिलाषे च ।" अमरकोष--3.3.232
(2.) "गायत्री प्रमुखं छन्दः ।" अमरकोष 2.7.22
(3.) "इच्छासंहितयोरार्षे छन्दो वेदे च छन्दसि ।।" काशिका--1.2.36
(4.) "गायत्रीप्रभृतिच्छन्दो वेदच्छयोरपि ।" शाश्वत--402
(5.) "छन्दः पद्येच्छयोः श्रुतौ । हैम, अनेकार्थ 583
(6.) "छन्दः पद्ये च वेदे च स्वैराद्याचाराभिलाषयोः ।" मेदिनी 22
इन वचनों के अनुसार "छन्दः" पद निम्न अर्थों में प्रयुक्त होता हैः---
(1.) गायत्री आदि पद्य,
(2.) वेद,
(3.) आर्ष (ऋषिप्रोक्त ग्रन्थ)
(4.) संहिता (सन्धि)
(5.) इच्छा (अभिलाषा)
(6.) स्वैर (अनियन्त्रित आचार)
इस प्रकार छन्दः पद वैदिक और लौकिक वाङ्मय में अनेक अर्थों में प्रयोग होता है । यहाँ पर छन्दः पद का क्या अर्थ होना चाहिए । आइए देखते हैं---
यहाँ पर छन्दः पद का अर्थ गायत्री आदि निबद्ध पद्य-गद्य रचनाविशेष ही अभिप्रेत है ।
एक भ्रान्ति----
कुछ विद्वान् छन्दः पद का अर्थ केवल पद्य मानते हैं । लोक में भी प्रायः करके छन्द पद पद्य अर्थ में ही प्रसिद्ध है । इसी कारण अनेक आचार्य "यजुर्वेद" मन्त्रों को छन्द नहीं मानते हैं ।
जैसे---
(1.) "यजुषामनियताक्षरत्वाद् एकेषां छन्दो न विद्यते ।" (शुक्लयजुः सर्वानुक्रमणी)
(2.) "यजुषां च विशेषविहितं छन्दो न दृश्यते क्वचित् ।" (गुणविष्णु छान्दोग्य मन्त्रब्राह्मण-भाष्य)
(3.) "यजुर्मन्त्राणां त्वपरिमिताक्षरोपेतत्वाच्छन्दोविभागो नास्ति ।" (सायण, छान्दोग्य मन्त्रब्राह्मण-भाष्य)
वस्तुतः प्राचीन आचार्यों के अनुसार छन्द गद्य और पद्य दोनों में होता है । जैसेः--
(क) आचार्य दुर्ग निरुक्त 7.2 की वृत्ति में किसी लुप्त ब्राह्मण का वचन उद्धृत करते हैं---
"नाच्छन्दसि वागुच्चरति इति ।"
अर्थः---छन्द के बिना वाक् उच्चरित नहीं होती है ।
(ख) भरत मुनि ने नाट्यशास्त्र में लिखा है---
"छन्दो हीनो न शब्दोस्ति , न छन्दः शब्दवर्जितम् ।" (14.45)
अर्थः---छन्द से रहित कोई शब्द नहीं और शब्द से रहित कोई छन्द नहीं ।
(ग) कात्यायन मुनि के नाम से प्रसिद्ध "ऋग्यजुष परिशिष्ट" में लिखा है--
"छन्दोभूतमिदं सर्वं वाङ्मयं स्याद् विजानतः ।
नाच्छन्दसि न चापृष्टे शब्दश्चरति कश्चन ।।"
अर्थः----ज्ञानी पुरुष के लिए सारा वाङ्मय छन्दोरूप है । क्योंकि छन्द और पृच्छा (जानने की इच्छा) के विना कोई शब्द प्रवृत्त नहीं होता ।
(घ) जयकीर्ति अपने छन्दोनुशासन में लिखता है---
"छन्दोभाग्वाङ्मयं सर्वं न किञ्चिच्छन्दसां विना ।" (1.2)
अर्थः---सम्पूर्ण वाङ्मय छन्द से युक्त है , छन्द के विना कुछ नहीं ।
क्रमशः.....
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रविवार, 24 अप्रैल 2016

तत्त्व-ज्ञानम्

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छान्दोग्योपनिषद् की एक प्रसिद्ध कथा पढिए ।
ग्यारह वर्षीय श्वेतकेतु पुत्र को बुलाकर ऋषि आरुणि ने कहा, "पुत्र आचार्य जी के पास पढने के लिए जाओ । हमारे कुल में आज तक कोई मूर्ख नहीं रहा ।" पुत्र श्वेतकेतु अध्ययन के लिए गुरुकुल गए और 24 वर्ष तक सभी वेदादि शास्त्रों को पढकर वापस घर आए । उसका मानना था कि उसने सभी विद्यायाएँ पढ ली है, उसका विद्या पर अधिकार है । इसलिए वह "सर्वश्रेष्ठ" है । पिता श्वेतकेतु ने देखा कि विद्या से विनम्रता आती है, जबकि आरुण तो अहंकारी हो गया है ।
उन्होंने सोचा कि इसे सबक सिखाना आवश्यक है, अन्यथा यह अनर्थ कर सकता है और अहंकार तो किसी चीज का ठीक नहीं होता ।
पिता ने कहा, "पुत्र, क्या तूने वह विद्या पढी है, जिसके पढ लेने से सब कुछ जान लिया जाता है ।"
पुत्र न अनभिज्ञता प्रकट करते हुए कहा, "पिताजी, आज तक मैंने ऐसी विद्या पढी नहीं । यदि ऐसी विद्या होती तो मेरे आचार्य मुझे अवश्य पढाते ।"
पिता ने कहा, "जानना चाहते हो ।"
पुत्र ने हामी भरी ।
पिता ने कहा, "देखो, सामने एक पीपल का वृक्ष है । उसका एक फल तोडकर ले आओ ।"
पुत्र एक फल तोडकर ले आया ।
पिता ने कहा, "इसे तोडो ।"
पुत्र ने उस फल के दो टुकडे कर दिए ।
पिता ने पूछा, "क्या देखते हो ।"
पुत्र ने कहा, "बीज"
पिता ने कहा, "अब एक बीज हाथ में लेकर तोडो ।"
पुत्र ने तोड दिया ।
पिता ने पूछा, "क्या देखते हो ।"
पुत्र ने कहा, "कुछ भी नहीं ।"
पिता ने कहा, "जो तुम्हे कुछ नहीं दीखता है, उसी में एक महान् विशाल वृक्ष बैठा हुआ है । पुत्र, विश्वास करो, कि इस नन्हें से बीज से ही इतना विशाल वृक्ष बनता है । यह दीखता नहीं, किन्तु है और बहुत विशाल है ।"
दूध में घी कहीं नहीं दीखता, किन्तु यदि उसे गरम कर दिया जाए, विलो दिया जाए, तो मक्खन दिखेगा और उसे गरम कर दिया जाए, तो घी अलग हो जाएगा ।
यदि दूध में घी नहीं दीखता तो इसका अभिप्राय यह नहीं है कि उसमें घी नहीं है ।
पिता ने कहा, "पुत्र एक मिट्टी के पात्र में नमक घोल दो । अब बताओ कि नमक दीखता है ।"
पुत्र ने कहा, "नहीं ।"
पिता ने कहा, "नमक कहाँ गया ।"
फिर पिता ने कहा कि इस जल का आचमन करो ।"
पुत्र ने आचमन किया और बताया कि यह जल नमकीन है ।
पिता बोले, "जिस तरह नमक पूरी तरह से जल में घुल गया और सारे जल में मिल गया । उसी तरह हर पदार्थ में वह "सत्" तत्त्व व्यापक है । उस तत्त्व को जानने का प्रयत्न करो ।"
जिस तरह एक सूक्ष्म बीज में वट जैसे वृक्ष विद्यमान है, उसी तरह परमात्मा भी सर्वत्र विद्यमान है । आरुणि विश्वास करो कि वही तत्त्व है, वही सत् है, वही तुम हो "तत्त्वमसि"
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