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शनिवार, 9 अप्रैल 2016

छन्द-पद के अर्थ

!!!---: छन्द-पद के अर्थ :---!!!
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वैदिक, लौकिक वाङ्मय में "छन्दः" पद विविध अर्थों में प्रयुक्त होता है । यथा--

वैदिक संस्कृत में---
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वैदिक वाङ्मय में "छन्दः" पद के अनेक अर्थ उपलब्ध होते हैं । उनमें से कतिपय इस प्रकार हैः---

(1.) सूर्य---छन्द का अर्थ सूर्य हैः--
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"छन्दांसि वै व्रजो गोस्थानः ।" (तैत्तिरीय-ब्राह्मण---3.2.9.3)

अर्थः---छन्द निश्चय ही व्रज (बाडा) है गोस्थान का ।

यहाँ "गो" शब्द रश्मियों का वाचक है । रश्मियों का स्थान बाडा सूर्य ही है ।

(यत्र गावो भुरिशृंगा अयासुः---ऋग्वेदः---1.154.6)

(2.) सूर्यरश्मिः--
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ब्राह्मण-ग्रन्थों में सूर्य की रश्मियों के लिए भी छन्द पद का प्रयोग असकृत उपलब्ध होता है । यथा--


अन्नं वाव पशवः, तान्यस्मा (प्रजापतये) अच्छदर्यस्तानि यदस्मा अच्छदर्यस्तस्माच्छन्दांसि ।" (शतपथ-ब्राह्मणः--8.5.2.1)

अर्थः---अन्न ही पशु है, उन्होंने प्रजापति को आच्छादित किया । जो इसको आच्छादित किया, इससे इनको "छन्द" कहते हैं ।

शतपथ के इस प्रकरण में प्रजापति शब्द से आदित्य ही अभिप्रेत है । आदित्यरूपी प्रजापति को आच्छादित करने वाले पशु अथवा अन्न रश्मियाँ ही हैं । इसका स्पष्टीकरण अगले ब्राह्मण में इस प्रकार किया हैः---

"एष वै रश्मिरन्नम् ।" (शतपथ-ब्राह्मण---8.5.3.3)

अर्थः---यह निश्चय ही रश्मि ही अन्न है ।

ऐतरेय-ब्राह्मण (2.18) में छन्दों को प्रजापति का अङ्ग कहा है---

"प्रजापतेर्वा एतान्यङ्गानि यच्छन्दांसि ।"

अर्थः---इससे स्पष्ट है कि प्रजापति--आदित्य के साथ सम्बन्ध रखने वाले आधिदैविक छन्द उसकी अङ्गभूत रश्मियाँ ही है ।

वैदिक रहस्य का पुराणों में स्पष्टीकरण---
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उक्त वैदिक रहस्य का स्पष्टीकरण पुराणों में इस प्रकार किया हैः---

"छन्दोभिरश्वरूपैः ।" (वायुपुराणः--52.45)

"छन्दोरूपैश्च तैरश्वैः ।" (मत्स्यपुराणः--125.42)

"छन्दोभिर्वाजिनरूपैस्तु ।" (वायुपुराण--51.57) (मत्स्यपुराण---124.4)

हयाश्च सप्त छन्दांसि ।" (विष्णुपुराण--2.8.7)

पुराणों के इन वचनों से स्पष्ट है कि सूर्य के प्रसिद्ध सात अश्व रश्मियाँ ही छन्द है ।

सूर्यरश्मि के अर्थ में छन्दः पद का प्रयोग ऋग्वेद में भी उपलब्ध होता है । यथा---

"श्रिये छन्दो न स्मयते विभाती ।" (ऋग्वेदः---1.92.6)

अर्थः----श्री (प्रकाश) के लिए छन्द के समान (उषा) मुस्कुराती है , प्रकाश करती हुई ।

(3.) सप्त धाम
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माध्यन्दिन संहिता (17.79) की व्याख्या करते हुए शतपथ-ब्राह्मण (9.2.3.44) में लिखा हैः---

"छन्दांसि व अस्य (अग्नेः) सप्त धाम प्रियाणि ।"

अर्थः---छन्द ही निश्चय से इस (अग्नि) के सात धाम प्रिय है । वे सात धाम कौन से हैं, यह अनुसन्धेय है ।

(4.) अग्नि की प्रिया तनू----
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तैत्तिरीय संहिता (5.2.1) में तित्तिरि का प्रवचन है---

"अग्नेर्वै प्रिया तनू छन्दांसि ।"

अर्थः---अग्नि की प्रिय तनू ही छन्द है ।

वैदिक साहित्य में इसी प्रकार अनेक अर्थों में छन्दः पद का प्रयोग मिलता है ।


(5.) वेदविशेषः----
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महर्षि दयानन्द सरस्वती ने अपनी ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका में यजुर्वेद (31.7) का व्याख्यान करते हुए छन्दांसि का अर्थ अथर्ववेद किया है---

"(छन्दांसि) अथर्ववेदश्च । ...........वेदानां गायत्र्यादिछन्दोन्विततया पुनश्छन्दांसीति पदं चतुर्थस्याथर्ववेदस्योत्पत्तिं ज्ञापयतीति अवधेयम् ।"
(ऋग्वेदादि. वेदोत्पत्ति-प्रकरण)
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मंगलवार, 5 अप्रैल 2016

वैदिक छन्द--2

!!!---: वैदिक छन्द :---!!!
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इससे पहले एक लेख लिखा जा चुका है । वह लेख वैदिक छन्द की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है । आज दूसरा लेख लिख रहे हैं ।

"विद्या-स्थानः----
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छन्दः-शास्त्र केवल वेद का उपकारक ही नहीं, अपितु अन्य वेदांगों के समान यह स्वतन्त्र विद्या-स्थान भी है । "तदिदं विद्यास्थानं व्याकरणस्य कार्त्स्न्यम्, स्वार्थ-साधकं च ।" (निरुक्तः---1.5)

काव्य-वाङ्मय का तो यह प्राण है । इसके ज्ञान के विना न केवल नवीन काव्य-सर्जन ही असम्भव है, अपितु वैदिक और प्राचीन लौकिक काव्यों में अप्रतिहत गति भी अशक्य है । अतः इसके ज्ञान के विना कवि के सूक्ष्मतम अभिप्रायों तक पहुँचना तो बहुत दूर की बात है ।

उपेक्षित-शास्त्रः-----
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अत्यन्त महत्त्वपूर्ण विद्या का प्रतिपादक होने पर भी यह शास्त्र चिरकाल से उपेक्षा का पात्र बना रहा है । जो विद्वान् नूतन काव्य-सर्जन के लिए इस शास्त्र का अभ्यास करते हैं, वे भी प्रायः "वृत्तरत्नाकर" , "छन्दोमञ्जरी" आदि अर्वाचीन लघुग्रन्थों का अवलोकन करके अपने को कृतकृत्य समझते हैं । पिंगल आदि प्राचीन आचार्यों के शास्त्रों का, जिनमें वैदिक और लौकिक उभयविध काव्यों के छन्दों का अनुशासन है, पढने-पढाने का प्रयास ही नहीं करते । विद्वानों की इस उपेक्षा के कारण इस शास्त्र के प्रायः सभी प्राचीन ग्रन्थ लुप्त हो गए । इतना ही नहीं, आचार्य पिंगल के सुप्रसिद्ध छन्दःशास्त्र पर भी गिनती के चार-पाँच विद्वानों के ही व्याख्या-ग्रन्थ उपलब्ध होते हैं । उनमें भी अभी तक एकमात्र हलायुध की व्याख्या प्रकाश में आई है।

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सोमवार, 21 मार्च 2016

वैदिक-छन्द--1

!!!---: वैदिक-छन्द :---!!!
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यह लेख बहुत से पाठकों की माँग पर लिखा जा रहा है । हमारे सुधी पाठक बहुत समय से यह माँग कर रहे थे कि छन्द पर कुछ लिखें । वैदिक छन्दों की जानकारी हम इसी पृष्ठ पर देंगे, किन्तु लौकिक छन्दों की जानकारी गीर्वाणवाणी पृष्ठ पर दे रहे हैं । पाठकों से निवेदन है कि वे इस लेख को अवश्य पढें और लेख को शेयर करें ।

वेद के विद्वानों, पाठकों और स्वाध्यायशील महानुभावों के समक्ष यह विस्तृत लेख "वैदिक-छन्द" प्रस्तुत किया जा रहा है । वैदिक छन्दःशास्त्र का विषय अतिगम्भीर और बहुत विस्तृत है । प्राचीनकाल में वैदिक छन्दःशास्त्र सम्बन्धी बहुत से ग्रन्थ विद्यमान थे । वे प्रायः कराल काल के चक्र में लुप्त हो गए । इस समय उनमें से कतिपय ग्रन्थों और ग्रन्थकारों ने ही नाम संस्कृत वाङ्मय में उपलब्ध होते हैंः------

(1.) ऋक्प्रातिशाख्य----शौनक प्रोक्त
(2.) ऋक्सर्वामुक्रमणी----कात्यायन प्रोक्त,
(3.) निदानसूत्र---पतञ्जलि प्रोक्त,
(4.) उपनिदानसूत्र---गार्ग्य प्रोक्त,
(5.) शाङ्खायन श्रौत----शांखायन प्रोक्त,
(6.) ऋगर्थदीपिका--अन्तर्गत छन्दोनुक्रमणी--वेकंट माधव प्रोक्त,
(7.) छन्दःसूत्र---पिङ्गल प्रोक्त,
(8.) छन्दःसूत्र---जयदेव प्रोक्त,

इन आठ पाठों में प्रथम 6 ग्रन्थों के मुख्य प्रतिपाद्य विषय अन्य है, इनमें प्रसंगात् वैदिक छन्दों के लक्षण और प्रपञ्च दिखाएँ हैं । केवल अन्तिम दो ग्रन्थ ही ऐसे हैं, जो विशुद्ध से छन्दोविषयक हैं । इन दोनों ग्रन्थों में वैदिक और लौकिक दोनों प्रकार के छन्द विद्यमान है ।

ऊपर जितने उपलब्ध छन्दःशास्त्रों का उल्लेख किया है, उनमें केवल पिंगल प्रोक्त छन्दोविचिति ही सर्वसाधारण है । अन्य ग्रन्थ प्रायः तत्-तत् संहिता-विशेषों से और वह भी याज्ञिक प्रक्रिया से सम्बन्ध रखते हैं । इसलिए हम वैदिक छन्दों के ज्ञान के लिए इसी ग्रन्थ से परिभाषा और उदाहरण प्रस्तुत करेंगे ।

संस्कृत वाङ्मय में छन्दःशास्त्र एक प्रमुख और महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है । संसार के समस्त वाङ्मय में प्राचीन और मूर्धाभिषिक्त वेद का यह साक्षात् उपकारक है । इसलिए वेद के अर्थ-ज्ञान में साक्षात उपकारक षडंगों में इसे अन्यतम स्थान प्राप्त है । छन्दःशास्त्र वेद का पादवत् उपकारक हैः---"छन्दः पादौ तु वेदस्य" वेदार्थ का महत्त्वपूर्ण प्रासाद इसी शास्त्र की नींव पर प्रतिष्ठित है . इसलिए इस शास्त्र के सम्यक् ज्ञान के विना वेद के सूक्ष्म अर्थ की प्रतीति असम्भव है ।

यह लेख बहुत विस्तृत है, अतः इसे थोडा-थोडा करके प्रस्तुत करेंगे । व्यवधान के लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं ।




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