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सोमवार, 29 जून 2020

ज्ञानेंद्रियों का कर्म


ज्ञान प्राप्ति के साधन हैं :--- आंखें, कान, नाक, रसना और त्वचा । इनमें प्रमुख है :--- आंख और कान । आंखों और कानों से हम बाहरी वस्तुओं का ज्ञान प्राप्त करते हैं । इस ज्ञान प्राप्ति की प्रक्रिया इस प्रकार है :---

"आत्ममनसोः संयोगविशेषात्संकाराच्च स्मृतिः ।।"

जब आंख और कान (अथवा अन्य 3 ज्ञानेंद्रियां) किसी पदार्थ के साथ संबद्ध होते हैं तो उस इंद्रिय के साथ मन का संयोग होता है और मन के साथ आत्मा का----- इस क्रमबद्ध प्रक्रिया से संस्कार बनते हैं और संस्कारों से स्मृति का निर्माण होता है । स्मृति के पीछे संस्कार संस्कारों के पीछे आत्मा और आत्मा के पीछे मन और मन के साथ इंद्रिय संयोग और इंद्रिय के साथ पदार्थ का संयोग यह एक क्रम है । 

इसे इस तरह से समझना चाहिए कि कहीं जाते हुए आपने जलेबी देखी । सुन्दर जलेबी देखकर मीठी-मीठी गन्ध नाक से सुंघकर अपनी प्रतिक्रिया की । आंख, नाक और रसना ने खाने की इच्छा व्यक्त की । उन सब ने अपनी इच्छा मन से प्रकट की । मन ने अपनी इच्छा बुद्धि के पास प्रस्तुत की । बुद्धि ने उचित अनुचित परामर्श करके आत्मा के पास वही इच्छा भेज दी ।  बुद्धि का काम है , निर्णय करना कि इसे खाया जाए या नहीं खाया जाए । वह अपना निर्णय आत्मा को भेजती है । यदि आत्मा कमजोर है इंद्रियों का गुलाम है तो वह बात मान लेगा और यदि वह स्वतंत्र है तो उस पर शत-शत विचार करके उचित निर्णय लेगा । 

इस प्रक्रिया में प्रतिदिन उसी प्रकार से कार्य करने से संस्कार बनते हैं ।

शुक्रवार, 26 जून 2020

सहनशीलता

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             जीवन में सुख-दुःख का चक्र चलता रहता है।
 कुछ लोग ऐसे होते हैं जो बड़ी से बड़ी विपदा को भी हँसकर झेल जाते हैं।

विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा, 
सदसि  वाक्पटुता  युधि  विक्रमः ।
यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं  श्रुतौ, 
प्रकृतिसिद्धमिदं   हि  महात्मनाम्   ।।
(नीतिशतकम् ५९)

विपत्ति में धैर्य ,समृद्धि में क्षमाशीलता , सभा में वाक्पटु , युद्ध में पराक्रम ,यशस्वी ,वेद शास्त्रों का ज्ञाता ,ये छः गुण महापुरुषों में स्वाभाविक रूप से होते हैं  ।


कुछ लोग ऐसे होते हैं जो एक दुःख से ही इतने टूट जाते हैं कि,  पूरे जीवन उस दुःख से मुक्त नहीं हो पाते हैं। हमेशा अपने दुःख को सीने से लगाये घूमते रहते हैं।

  जबकि हकीकत यह है कि जो बीत गया सो बीत गया। अब उसमे तो कुछ नहीं किया जा सकता,  पर इतना जरूर है कि उसे भुलाकर अपने भविष्य को एक नई दिशा देने के बारे में तो सोचा ही जा सकता है।
    
  हम बच्चों को बहुत सारी बातें सिखाते हैं मगर उनसे कुछ भी नहीं सीखते।

बच्चों से भूलने की कला हमको सीखनी चाहिए। हम बच्चों पर गुस्सा करते हैं, उन्हें डांटते भी है लेकिन बच्चे थोड़ी देर बाद उस बुरे अनुभव को भूल जाते हैं।
 
 सर्वं परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम् ।
एतद्विद्यात्समासेन लक्षणं सुखदुःखयोः ।।

अर्थात जो कार्य दूसरे के अधीन में होता है वह सदैव मनुष्य को दुःख प्रदान करता है और जो कार्य अपने वश में होता है अथवा अपने नियन्त्रण में होता है वह सदैव सुख देने वाला होता है । संक्षेप में यही सुख और दुःख के लक्षण समझने चाहिए ।

बुधवार, 24 जून 2020

परिश्रम शील बने

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लेखक :--- योगाचार्य डॉक्टर प्रवीण कुमार शास्त्री

मानव जीवन परिश्रम करने के लिए ही मिला है । परिश्रम अर्थात् कर्म करना । कर्म करके ही व्यक्ति महान् बनता है । कर्म करके ही व्यक्ति मोक्ष की ओर बढ़ता है । जो व्यक्ति कर्म नहीं करता, परिश्रम नहीं करता, उसका जीवन निम्न गति का हो जाता है । ऐसे मनुष्यों को परमात्मा कर्म करने के लिए दूसरी योनियाॅ प्रदान करते हैं  । जो व्यक्ति मानव जीवन में आरामतलबी हो जाता है, आलसी हो जाता है, परिश्रमहीन हो जाता है । ऐसे व्यक्तियों को अगले जन्म में गधा, बैल, भैंसा या ऐसी योनि देते हैं, जिसमें बहुत अधिक परिश्रम करना पड़े ।इसलिए परिश्रम से हमें कभी अलग नहीं होना चाहिए । लेखक :--- योगाचार्य डॉक्टर प्रवीण कुमार शास्त्री

वैसे भी यह शरीर हम सब को निःशुल्क मिला है । हमने इसके लिए कोई मूल्य नहीं चुकाया है । परमात्मा की दी हुई रचना है । तो इस शरीर से बहुत मेहनत करवानी चाहिए । हां, इसकी रक्षा करनी आवश्यक है । इसकी वृद्धि करनी आवश्यक है । किंतु फ्री का माल है इसलिए शरीर से बहुत मेहनत करवानी चाहिए । लेखक :--- योगाचार्य डॉक्टर प्रवीण कुमार शास्त्री

महान् नीतिकार महात्मा विदुर ने कहा है कि गरीब होकर जो मेहनत न करें, उसे बहुत बड़ी सजा देनी चाहिए :--


द्वौ अम्भसि निवेष्टव्यौ गले बद्ध्वा दृढां शिलाम् ।
धनवन्तम् अदातारम् दरिद्रं च अतपस्विनम् ॥

दो प्रकार के लोग होते हैं, जिनके गले में पत्थर बांधकर उन्हें समुद्र में फेंक देना चाहिए. पहला, वह व्यक्ति जो अमीर होते हुए दान न करता हो. दूसरा, वह व्यक्ति जो गरीब होते हुए कठिन परिश्रम नहीं करता हो । लेखक :--- योगाचार्य डॉक्टर प्रवीण कुमार शास्त्री

त्यजन्ति मित्राणि धनैर्विहीनं पुत्राश्च दाराश्च सहृज्जनाश्च ।
तमर्थवन्तं पुनराश्रयन्ति अर्थो हि लोके मनुष्यस्य बन्धुः ॥

मित्र, बच्चे, पत्नी और सभी सगे-सम्बन्धी उस व्यक्ति को छोड़ देते हैं जिस व्यक्ति के पास धन नहीं होता है । फिर वही सभी लोग उसी व्यक्ति के पास वापस आ जाते हैं, जब वह व्यक्ति धनवान् हो जाता है । धन हीं इस संसार में व्यक्ति का मित्र होता है । लेखक :--- योगाचार्य डॉक्टर प्रवीण कुमार शास्त्री

यस्तु सञ्चरते देशान् सेवते यस्तु पण्डितान् ।
तस्य विस्तारिता बुद्धिस्तैलबिन्दुरिवाम्भसि ॥

वह व्यक्ति जो विभिन्न देशों में घूमता है और विद्वानों की सेवा करता है । उस व्यक्ति की बुद्धि का विस्तार उसी तरह होता है, जैसे तेल का बूॅद पानी में गिरने के बाद फैल जाती है । लेखक :--- योगाचार्य डॉक्टर प्रवीण कुमार शास्त्री

जिस व्यक्ति के पास कोई कला नहीं होती,उसे कोई नहीं चाहता ।

येषां न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः।
ते मर्त्यलोके भुविभारभूता मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति ॥

जिन लोगों के पास न तो विद्या है, न तप, न दान, न शील, न गुण और न धर्म । वे लोग इस पृथ्वी पर भार हैं और मनुष्य के रूप में जानवर की तरह से घूमते रहते हैं । लेखक :--- योगाचार्य डॉक्टर प्रवीण कुमार शास्त्री

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कार्यार्थी भजते लोकं यावत्कार्य न सिद्धति ।
उत्तीर्णे च परे पारे नौकायां किं प्रयोजनम् ॥

जबतक काम पूरे नहीं होते हैं, तबतक लोग दूसरों की प्रशंसा करते हैं. काम पूरा होने के बाद लोग दूसरे व्यक्ति को भूल जाते हैं. ठीक उसी तरह जैसे, नदी पार करने के बाद नाव का कोई उपयोग नहीं रह जाता है । लेखक :--- योगाचार्य डॉक्टर प्रवीण कुमार शास्त्री

कुछ लोग परिश्रम तो करना नहीं चाहते हैं, लेकिन सफल होना चाहते हैं । विश्व में बहुत महान् होना चाहते हैं । प्रसिद्ध होना चाहते हैं । ऐसे व्यक्ति केवल काल्पनिक होते हैं । आकाश के पुष्प की तरह होते हैं । उन्हें सफलता कभी नहीं मिल सकती ।

मंगलवार, 23 जून 2020

सभी प्राणी मित्र हो

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संसार में कोई भी किसी का शत्रु न हो । सभी व्यक्ति ऐसी भावना रखें । ऐसा व्यवहार करने से व्यक्ति अधिक से अधिक सुखी रह सकता है । जिस व्यक्ति के अधिक मित्र होते हैं, वे अधिक सुखी होते हैं । जिसके अधिक शत्रु होते हैं, वे अधिक दुःखी होते हैं । सर्वत्र भय का वातावरण होता है । जहां भी जाता है किसी न किसी से भय लगा रहता है । इसलिए सभी को मित्रता की दृष्टि से देखना चाहिए ।

यजुर्वेद में एक मंत्र आया है, जिसमें कहा गया है कि सभी को मित्रता की दृष्टि से देखें, सभी प्राणी मेरे मित्र हों, कोई मेरा शत्रु न हो  :----

"मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे । मित्रस्य चक्षुषा समीक्षामहे ।।" (यजुर्वेद ३६/१८)

मनुष्य कारण से ही किसी के साथ मित्रता या शत्रुता करता है । अतः मनुष्य को अकारण शत्रुता नहीं करनी चाहिए । यदि हो सके तो इस विश्व में सभी के साथ मित्रता का ही व्यवहार करना चाहिए :---

"कारणान्मित्रतां याति कारणादेति शत्रुताम् ।
तस्मान्मित्रत्वमेवात्र योज्यं वैरं न धीमता ।।"
(पञ्चतन्त्रम्, मित्रसम्प्राप्तिः २/३४)

गीता में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने भी कहा है कि सभी भूतों में अपने को देखो और अपने में सभी प्राणी को देखो । इसका अभिप्राय यही हुआ कि सभी अपने जैसे हैं । जिस प्रकार से मुझे अपने प्राण अच्छे लगते हैं, उसी प्रकार से सभी को अपने प्राण प्रिय लगते हैं । इसलिए किसी के साथ शत्रुता नहीं रखनी चाहिए :---

"सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ।।"
(गीता ६/२९)

ईशोपनिषद् में कहा गया है कि  जो निःसंदेह सभी प्राणियों को अपनी आत्मा (या परमात्मा) में देखता है, और सभी प्राणियों में स्वयं की आत्मा (या परमात्मा) का दर्शन पाता है, वह किसी से घृणा नहीं करता ।

"यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्न्येवानुपश्यति ।
 सर्वभूतेषु चात्मानम् ततो न विचिकित्सति ।।" 
(ईशोपनिषद् ६ )


सोमवार, 22 जून 2020

धन की तीन गतियां

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दानं भोगो नाशस्तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य ।।
यो न ददाति  न भुङ्क्ते  तस्य तृतीया गतिर्भवति।।

धन की तीन गतियां मानी गई है :--दान करना, भोग करना और नाश होना । जो व्यक्ति अपने धन का न तो दान करता है और न खुद उसका उपयोग करता है तो उसकी तीसरी गति होती है अर्थात् उस धन का नाश हो जाता है । लेखक--योगाचार्य डॉक्टर प्रवीण कुमार शास्त्री

जैसे शरीर में खून का प्रवाह अच्छा रहने से व्यक्ति का स्वास्थ्य अच्छा रहता है, वैसे ही बाजार में पैसे का प्रवाह चलते रहने से अर्थव्यवस्था का स्वास्थ्य भी बेहतर बनता है। जो लोग पैसा घरों की तिजोरियों में बंद करके रख देते हैं, न सिर्फ अपना नुकसान करते हैं अपितु देश की अर्थव्यवस्था की रफ्तार भी कम करते हैं। पैसे का स्वभाव ही ऐसा है कि वह जितना खर्च होता है, उतना वापस आता है। पैसे को गांठ में बांधने की बजाय ठीक से खर्च करना बेहतर विकल्प है।  लेखक--योगाचार्य डॉक्टर प्रवीण कुमार शास्त्री

पैसे को जमा करके रखने वालों की तिजोरी पर सरकार की नजर पड़ती है और सरकार उसे ब्लैक मनी घोषित करके कब्जा कर लेती है । यही तीसरी गति है । इसलिए पैसे का सदुपयोग करें । दूसरों को दान दे, जिसको आवश्यकता है और वह उसका सदुपयोग कर सकें । उसका खुद अपने जीवन पर खर्च करें, अन्यथा तीसरी गति होगी । कोई तीसरा ले जाएगा ।

संस्कृत सीखने के लिए इस पेज को लाइक करें :--- शिशु-संस्कृतम्

त्याग पूर्वक उपभोग

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यह सारी सृष्टि हमारे लिए ही हैं, किंतु इसका उपभोग त्यागपूर्वक करना चाहिए । सायनाचार्य ने लिखा है :---

"जीवानामुपभोगार्थं हि सृष्टिः ।"

त्याग भाव से जीवन के सब पदार्थों को भोगना चाहिए परमात्मा ने हमें सब पदार्थ दिए हैं । यह सब हमारे भोग के लिए हैं । यह सृष्टि और इसके सब उपकरण हमारे उपभोग के लिए बनाए गए हैं । यदि जीवों के उपभोग के लिए ना बनाए जाते, तो इनका बनाया जाना है व्यर्थ हो जाता :--- 

"तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः ।" (यजुर्वेद ४०/१)

मनुष्य अपने जीवन में चल एवं अचल संपत्ति का उपार्जन करता है । जीवन निर्वाह के लिए धन कमाता है । लोभ प्रवृत्ति को संतुष्ट करने के लिए धन संग्रह करता है । आजीविका एवं निवास के लिए जितनी आवश्यक भूमि अथवा संपत्ति चाहिए, उसका तो संग्रह करता ही हैं । लोभ को संतुष्ट करने के लिए इनका अधिक से अधिक उपार्जन भी करता है । धन संपत्ति और भूमि का अधिकार भी मनुष्य को दिया गया, परंतु प्रतिबंध है कि त्याग पूर्वक करो ।


शनिवार, 20 जून 2020

नास्ति त्यागसमं सुखम्

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"नास्ति त्यागसमं सुखम् ।"

इस संसार में किसी भी व्यक्ति वस्तु या स्थान से मोह नहीं करना चाहिए । मोह करने से दुःख बढ़ता है "नास्ति रागसमं दुःखम्" राग अर्थात् राग के समान कोई दूसरा दुःख नहीं हो सकता । जब हम वस्तु, व्यक्ति, स्थान का त्याग करते हैं, तब उससे अलौकिक आनंद की प्राप्ति होती है । एक कथा सुनिये :----

राजा विक्रमादित्य के राज्य में एक सदाचारी, सन्तोषी ब्राह्मण रहता था। वह निर्धन था, किंतु जितना धन था उसमें संतोष करता था । उसकी स्त्री इससे दुःखी रहती थी । एक बार स्त्री की प्रेरणा से धन प्राप्ति के निमित्त घर से निकला । नगर की ओर जा रहा था । रास्ता वन से होकर गुजरता था  । चलते चलते वन में एक महात्मा से भेंट हुई । उन्होने उसे चिन्तित देख आश्वासन दिया और विक्रमादित्य को प्रत्र लिखा कि तुम्हारी इच्छा पूर्ति का अब समय आ गया है। अपना राज्य इस ब्राह्मण को देकर यहाँ चले आओ। 


वह  निर्धन ब्राह्मण पत्र लेकर राजा विक्रमादित्य की सभा में पहुंचा और वह पत्र विक्रमादित्य को दिया । उस पत्र विक्रमादित्य ने पढ़ा तो उन्हें बडी प्रसन्नता हुई और ब्राह्मण को राज्य साँपने की तैयारी की। ब्राह्मण ने राजा को राज्य- त्याग के लिए इतना उत्सुक और अत्यन्त आनन्दविभोर देखा तो सोचने लगा कि जब राजा ही राज्य सुख को लात मारकर योगी के पास जाने में विशेष आनन्द अनुभव कर रहे है तो योगी के पास अवश्य ही कोई राज्य से भी बड़ा सुख है। अत: उसने राजा से कहा,  '' महाराज। मै अभी महात्मा जी के पास पुन : जा रहा हूँ, लौटकर राज्य लूँगा। '' यह कहकर वह योगी के पास पहुँचकर बोला, '' भगवन्। राजा तो राज्य- त्याग कर आपके पास आने के लिए नितान्त उतावला और हर्ष विभोर हो रहा है । इससे जान पड़ता है कि आपके पास राज्य से भी बड़ी कोई वस्तु है, मुझे वही दीजिए। '' 

महात्मा ने प्रसन्नचित्त हो ब्राह्मण देवता को आत्मविद्या सिखाई और उसे वह वैभव दे दिया जो उसे मोक्ष दिला गया। उस सुख की तुलना में सारे सांसारिक सुख नगण्य है।

जो आत्मावलम्बी बहुरंगीय दुनिया के सुख- आकर्षणों को ठुकराता है, अन्तत : वही इस श्रेय का भागी बनता है। जो क्षणिक सुख लाभ के मोह में उन्हीं में लिप्त हो जाते हैं थे अन्ततः दुःखी होते हैं, भले ही उन्हें उसमें तात्कालिक दृष्टि से सुख मिलता हो। उनकी उपमा तो उस बालक से ही दी जा सकती है जो खिलौनों से खेलकर सामयिक आनन्द पाने में ही रुचि लेता है। आयु की दृष्टि से बड़े  होने पर भी ऐसे मन्दबुद्धि बालकों का अनुपात जन समुदाय में अधिक ही होता है। इसलिए त्याग करें । घर में जितना कम सामान ला सके उतना अच्छा ।

दान श्रेष्ठ वृत्ति

दान करने वाले व्यक्ति सदैव सुखी होते हैं 
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सातिर्न वोऽमवती स्वर्वती त्वेषा विपाका मरुतः पिपिष्वती।
भद्रा वो रातिः पृणतो न दक्षिणा पृथुज्रयी असुर्येव जञ्जती॥ 
(ऋग्वेद १/१६८/७)

हे श्रेष्ठ विद्वानों! तुम सभी को अपने ज्ञान के दान से लाभ पहुंचाते हो, आपकी ज्ञान दीप्ति विविध प्रकार से मनुष्यों का कल्याण करती है, दान लोभवृत्ति को नष्ट करता है, और वासनाओं को दूर भगाता है। यह दानवृत्ति तीव्र वेग वाली है। दानवृत्ति वाले मनुष्य सदैव सुखी रहते हैं।


गुरुवार, 18 जून 2020

परमात्मा की सृष्टि में कमियां

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नास्तिकों ने इस सृष्टि में अनेक त्रुटियां बताई हैं ।  कुछ त्रुटियां भर्तृहरि  ने अपने नीतिशतक में दिखलाया है :----

"गन्धं सुवर्णै फलमिक्षुदण्डे
नाकारि पुष्पं खलु चन्दनस्य ।
विद्वान् धनी भूपतिर्दीर्घजीवी 
धातुः पुरा कोSपि न बुद्धिदोSभूत् ।।

कोई नास्तिक परमात्मा पर आक्षेप करता हुआ कहता है, "सोने में सुगंध नहीं, ईख पर फल नहीं, चंदन के पेड़ पर फूल नहीं, विद्वान धनी नहीं, राजा दीर्घजीवी नहीं, यह परमात्मा का कैसा बुद्धिहीन विधान है ? क्या उसे अक्ल सिखाने वाला कोई नहीं मिला ?" संकलनकर्ता :--- योगाचार्य डॉ. प्रवीण कुमार शास्त्री

यदि सोने में सुगंध होती तो उससे बहुत नुकसान होता । इस समय सोने में मिलावट तथा अन्य मलिनताओं की सफाई के लिए उसे अग्नि में डालकर तपा कर, पीटकर शुद्ध किया जाता है । जैसा कि कवि कालिदास ने भी एक प्रसंग में कहा है :--- 

"हेम्नः संलक्ष्यते ह्यग्नौ विशुद्धिः श्यामिकापि वा"
सोने के खरे और खोटेपन को अग्नि में ही परखा जाता है । संकलनकर्ता :--- योगाचार्य डॉ. प्रवीण कुमार शास्त्री

हम देखते हैं कि अग्नि अपने ताप से यदि वस्तु में दुर्गंध हो तो उसे समाप्त कर देती है और यदि सुगंध हो तो उसे भी अग्नि नष्ट कर देती है । अब नास्तिक के आक्षेप के अनुसार यदि सोने में सुगंधि होती तो आग में तपाने पर वह नष्ट हो जाती । परिणाम यह निकलता कि तपाया हुआ सोना कुंदन होने पर जहां अपना पूरा मूल्य पाता है वहां सुगंधि के अभाव में वह अपना मूल्य घटा बैठता । सोने में सुगंधि न देना बुद्धिमत्ता का द्योतक है, मूर्खता का नहीं । इसके अतिरिक्त सोने में यदि सुगंधि होती तो उसकी सुगंध चारों ओर फैल जाती और चोर डाकू को आसानी हो जाती ढूंढने में । इससे सोने का मालिक बहुत परेशान रहता । संकलनकर्ता :--- योगाचार्य डॉ. प्रवीण कुमार शास्त्री

दूसरा आक्षेप है ईख के गन्ने पर फल होना चाहिए था, यह आक्षेप भी बुद्धि संगत नहीं ।

ईख की फसल के लिए कृषक को भूमि भली प्रकार जोतकर तैयार करनी पड़ती है । उसमें खाद भी अच्छी मात्रा में डालनी पड़ती है । ईख बोने के बाद अंकुरित होने पर उसकी बार-बार गुड़ाई सिंचाई करनी पड़ती है । जब ईख का गन्ना बढ़कर परिपक्व हो जाता है तो कृषक को उसके लिए कोई काम नहीं करना पड़ता ।‌वह अपनी सुविधा के अनुसार काटकर कोल्हू में पैर कर रस निकालकर गुड़ आदि वस्तुएं बना लेता है । यदि गन्ने के पेड़ पर फल लगता तो फल भी बहुत मीठा होता और उसको खाने के लिए चील, कौवे, कुत्ते, चीटियां, मक्खियां मकोड़े, सैकड़ों प्रकार के जीव जंतु आ जाते और किसान के लिए उसे सुरक्षित रखना कठिन हो जाता । गन्ने पर जो छिलका होता है , जो बहुत मजबूत होता है । इसलिए उस पर कोई जीव जंतु हमला नहीं करता । किसान रस से गुड़ चीनी, शक्कर, राब शीरा, स्प्रिट, शराब, सिरका ना जाने कितनी वस्तुएं तैयार कर लेता है । इस प्रकार विचार करने से यह सिद्ध होता है कि ईख  पर फल ना लगाना उचित है । संकलनकर्ता :--- योगाचार्य डॉ. प्रवीण कुमार शास्त्री

तीसरा आक्षेप है कि चंदन के ऊपर फूल नहीं लगाया इसका विश्लेषण करके देखें तो वनस्पति जगत में यह एक नियम-सा प्रतीत होता है कि जिस के ऊपर सुगंधित फूल अथवा कोई विशेष प्रकार के फल लगते हैं, उनकी लकड़ी में कोई विशेषता नहीं होती और जिनके लकड़ी अथवा पत्तों में विशेष गंध होती है, उसमें या तो फूल लगते नहीं, लगते भी हैं तो कोई उल्लेख बात नहीं होती ।  जैसे गुलाब मोतिया केवड़ा चंपा चमेली नरगिस आदि । इनमें सुगंधित पुष्प है किंतु इनके पत्तों लकड़ी में कोई विशेषता नहीं है । जिनके पत्तों अथवा लकड़ी में गुण है जैसे तुलसी महुआ यूकेलिप्टस चंदन आदि । इनके फूलों में कोई गुण विशेष नहीं होता । चंदन तथा युकेलिप्टस में फूल लगते ही नहीं । इस नियम के अनुसार चंदन पर यदि फल लगता और दिव्य गंध से सुवासित भी होता । तब भी जितना स्थायित्व चंदन की लकड़ी की गंध में है फुल में वह कहां हो सकता था ? फूल दो-चार दिन से  अधिक सुगंधि नहीं दे सकता है । जबकि चंदन की लकड़ी सैकड़ों वर्षो तक महकती रहती है । इसके अतिरिक्त संस्कृत और हिंदी साहित्य के कवि लोग चंदन का वर्णन करते हैं तो वहां सर्पों का वर्णन अवश्य आता है जैसे :--- संकलनकर्ता :--- योगाचार्य डॉ. प्रवीण कुमार शास्त्री

"मूलं  भुजङ्गैः शिखरं विहङ्गैः ।"
जिसके जड़ तने से सांप लिपटे रहते हैं और जिस की चोटी पर पक्षी बैठते हैं ।

हिंदी के कवि ने कहा है :--

"जो रहीम उत्तम प्रकृति का करि सकत कुसंग ।
चन्दन विष व्यापत नहीं लिपटे रहत भुजंग ।।"

यदि चंदन की लकड़ी में इतनी गंध है और आकर्षण है यदि फूलों पर भी गंध होती तो सांप दौड़ दौड़ कर चंदन पर बैठे रहते और उसे कोई उसका उपयोग नहीं ले पाता । संकलनकर्ता :--- योगाचार्य डॉ. प्रवीण कुमार शास्त्री

चौथा आक्षेप है कि विद्वान् व्यक्ति धनी नहीं है, उसे धनी बनाना चाहिए था ।

विद्वान व्यक्ति के पास धन होता तो वह सत्य प्रकट नहीं करता और निश्चल नहीं होता । जिसके पास धन होता है किसी भी बात को सत्य बात को प्रकट करने में हिचकिचाता है और जो विद्या का धनी होता है लेकिन निर्धन होता है वह सीना तान कर भी बहुत कुछ कर सकता है । स्वामी दयानंद जो कह सकते थे विद्वान होकर निर्धन होकर वह और कोई नहीं कह सकता था । उनके समकालीन अनेक विद्वान ऐसे थे जो बहुत धनी थे । उनके सामने कहने से घबराते थे, डरते थे, किंतु एकांत में अपने मित्रों के पास जाकर कहते थे कि दयानंद जो कहता है सत्य कहता है, किंतु उनके सामने कहने की हिम्मत नहीं होती तो केवल दयानंद ही ऐसा कह सकते थे जो निर्धन थे किंतु विद्या के बहुत बड़े धनी थे । धनी व्यक्ति आलसी हो जाता है और विद्या में उन्नति नहीं कर पाता है ।  

इसलिए कहना चाहिए कि परमात्मा की बनाई हुई सृष्टि संपूर्ण है उसमें कोई त्रुटि नहीं है । जो कोई त्रुटि कहता है, वस्तुतः उसकी समझ विकसित नहीं हुई है ।