!!!---: सारा जगत् मित्र हो :---!!!
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संसार में कोई भी किसी का शत्रु न हो । सभी व्यक्ति ऐसी भावना रखें । ऐसा व्यवहार करने से व्यक्ति अधिक से अधिक सुखी रह सकता है । जिस व्यक्ति के अधिक मित्र होते हैं, वे अधिक सुखी होते हैं । जिसके अधिक शत्रु होते हैं, वे अधिक दुःखी होते हैं । सर्वत्र भय का वातावरण होता है । जहां भी जाता है किसी न किसी से भय लगा रहता है । इसलिए सभी को मित्रता की दृष्टि से देखना चाहिए ।
यजुर्वेद में एक मंत्र आया है, जिसमें कहा गया है कि सभी को मित्रता की दृष्टि से देखें, सभी प्राणी मेरे मित्र हों, कोई मेरा शत्रु न हो :----
"मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे । मित्रस्य चक्षुषा समीक्षामहे ।।" (यजुर्वेद ३६/१८)
मनुष्य कारण से ही किसी के साथ मित्रता या शत्रुता करता है । अतः मनुष्य को अकारण शत्रुता नहीं करनी चाहिए । यदि हो सके तो इस विश्व में सभी के साथ मित्रता का ही व्यवहार करना चाहिए :---
"कारणान्मित्रतां याति कारणादेति शत्रुताम् ।
तस्मान्मित्रत्वमेवात्र योज्यं वैरं न धीमता ।।"
(पञ्चतन्त्रम्, मित्रसम्प्राप्तिः २/३४)
गीता में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने भी कहा है कि सभी भूतों में अपने को देखो और अपने में सभी प्राणी को देखो । इसका अभिप्राय यही हुआ कि सभी अपने जैसे हैं । जिस प्रकार से मुझे अपने प्राण अच्छे लगते हैं, उसी प्रकार से सभी को अपने प्राण प्रिय लगते हैं । इसलिए किसी के साथ शत्रुता नहीं रखनी चाहिए :---
"सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ।।"
(गीता ६/२९)
ईशोपनिषद् में कहा गया है कि जो निःसंदेह सभी प्राणियों को अपनी आत्मा (या परमात्मा) में देखता है, और सभी प्राणियों में स्वयं की आत्मा (या परमात्मा) का दर्शन पाता है, वह किसी से घृणा नहीं करता ।
"यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्न्येवानुपश्यति ।
सर्वभूतेषु चात्मानम् ततो न विचिकित्सति ।।"
(ईशोपनिषद् ६ )
लेखक :--- योगाचार्य डॉ. प्रवीण कुमार शास्त्री
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