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गुरुवार, 18 जून 2020

परमात्मा की सृष्टि में कमियां

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नास्तिकों ने इस सृष्टि में अनेक त्रुटियां बताई हैं ।  कुछ त्रुटियां भर्तृहरि  ने अपने नीतिशतक में दिखलाया है :----

"गन्धं सुवर्णै फलमिक्षुदण्डे
नाकारि पुष्पं खलु चन्दनस्य ।
विद्वान् धनी भूपतिर्दीर्घजीवी 
धातुः पुरा कोSपि न बुद्धिदोSभूत् ।।

कोई नास्तिक परमात्मा पर आक्षेप करता हुआ कहता है, "सोने में सुगंध नहीं, ईख पर फल नहीं, चंदन के पेड़ पर फूल नहीं, विद्वान धनी नहीं, राजा दीर्घजीवी नहीं, यह परमात्मा का कैसा बुद्धिहीन विधान है ? क्या उसे अक्ल सिखाने वाला कोई नहीं मिला ?" संकलनकर्ता :--- योगाचार्य डॉ. प्रवीण कुमार शास्त्री

यदि सोने में सुगंध होती तो उससे बहुत नुकसान होता । इस समय सोने में मिलावट तथा अन्य मलिनताओं की सफाई के लिए उसे अग्नि में डालकर तपा कर, पीटकर शुद्ध किया जाता है । जैसा कि कवि कालिदास ने भी एक प्रसंग में कहा है :--- 

"हेम्नः संलक्ष्यते ह्यग्नौ विशुद्धिः श्यामिकापि वा"
सोने के खरे और खोटेपन को अग्नि में ही परखा जाता है । संकलनकर्ता :--- योगाचार्य डॉ. प्रवीण कुमार शास्त्री

हम देखते हैं कि अग्नि अपने ताप से यदि वस्तु में दुर्गंध हो तो उसे समाप्त कर देती है और यदि सुगंध हो तो उसे भी अग्नि नष्ट कर देती है । अब नास्तिक के आक्षेप के अनुसार यदि सोने में सुगंधि होती तो आग में तपाने पर वह नष्ट हो जाती । परिणाम यह निकलता कि तपाया हुआ सोना कुंदन होने पर जहां अपना पूरा मूल्य पाता है वहां सुगंधि के अभाव में वह अपना मूल्य घटा बैठता । सोने में सुगंधि न देना बुद्धिमत्ता का द्योतक है, मूर्खता का नहीं । इसके अतिरिक्त सोने में यदि सुगंधि होती तो उसकी सुगंध चारों ओर फैल जाती और चोर डाकू को आसानी हो जाती ढूंढने में । इससे सोने का मालिक बहुत परेशान रहता । संकलनकर्ता :--- योगाचार्य डॉ. प्रवीण कुमार शास्त्री

दूसरा आक्षेप है ईख के गन्ने पर फल होना चाहिए था, यह आक्षेप भी बुद्धि संगत नहीं ।

ईख की फसल के लिए कृषक को भूमि भली प्रकार जोतकर तैयार करनी पड़ती है । उसमें खाद भी अच्छी मात्रा में डालनी पड़ती है । ईख बोने के बाद अंकुरित होने पर उसकी बार-बार गुड़ाई सिंचाई करनी पड़ती है । जब ईख का गन्ना बढ़कर परिपक्व हो जाता है तो कृषक को उसके लिए कोई काम नहीं करना पड़ता ।‌वह अपनी सुविधा के अनुसार काटकर कोल्हू में पैर कर रस निकालकर गुड़ आदि वस्तुएं बना लेता है । यदि गन्ने के पेड़ पर फल लगता तो फल भी बहुत मीठा होता और उसको खाने के लिए चील, कौवे, कुत्ते, चीटियां, मक्खियां मकोड़े, सैकड़ों प्रकार के जीव जंतु आ जाते और किसान के लिए उसे सुरक्षित रखना कठिन हो जाता । गन्ने पर जो छिलका होता है , जो बहुत मजबूत होता है । इसलिए उस पर कोई जीव जंतु हमला नहीं करता । किसान रस से गुड़ चीनी, शक्कर, राब शीरा, स्प्रिट, शराब, सिरका ना जाने कितनी वस्तुएं तैयार कर लेता है । इस प्रकार विचार करने से यह सिद्ध होता है कि ईख  पर फल ना लगाना उचित है । संकलनकर्ता :--- योगाचार्य डॉ. प्रवीण कुमार शास्त्री

तीसरा आक्षेप है कि चंदन के ऊपर फूल नहीं लगाया इसका विश्लेषण करके देखें तो वनस्पति जगत में यह एक नियम-सा प्रतीत होता है कि जिस के ऊपर सुगंधित फूल अथवा कोई विशेष प्रकार के फल लगते हैं, उनकी लकड़ी में कोई विशेषता नहीं होती और जिनके लकड़ी अथवा पत्तों में विशेष गंध होती है, उसमें या तो फूल लगते नहीं, लगते भी हैं तो कोई उल्लेख बात नहीं होती ।  जैसे गुलाब मोतिया केवड़ा चंपा चमेली नरगिस आदि । इनमें सुगंधित पुष्प है किंतु इनके पत्तों लकड़ी में कोई विशेषता नहीं है । जिनके पत्तों अथवा लकड़ी में गुण है जैसे तुलसी महुआ यूकेलिप्टस चंदन आदि । इनके फूलों में कोई गुण विशेष नहीं होता । चंदन तथा युकेलिप्टस में फूल लगते ही नहीं । इस नियम के अनुसार चंदन पर यदि फल लगता और दिव्य गंध से सुवासित भी होता । तब भी जितना स्थायित्व चंदन की लकड़ी की गंध में है फुल में वह कहां हो सकता था ? फूल दो-चार दिन से  अधिक सुगंधि नहीं दे सकता है । जबकि चंदन की लकड़ी सैकड़ों वर्षो तक महकती रहती है । इसके अतिरिक्त संस्कृत और हिंदी साहित्य के कवि लोग चंदन का वर्णन करते हैं तो वहां सर्पों का वर्णन अवश्य आता है जैसे :--- संकलनकर्ता :--- योगाचार्य डॉ. प्रवीण कुमार शास्त्री

"मूलं  भुजङ्गैः शिखरं विहङ्गैः ।"
जिसके जड़ तने से सांप लिपटे रहते हैं और जिस की चोटी पर पक्षी बैठते हैं ।

हिंदी के कवि ने कहा है :--

"जो रहीम उत्तम प्रकृति का करि सकत कुसंग ।
चन्दन विष व्यापत नहीं लिपटे रहत भुजंग ।।"

यदि चंदन की लकड़ी में इतनी गंध है और आकर्षण है यदि फूलों पर भी गंध होती तो सांप दौड़ दौड़ कर चंदन पर बैठे रहते और उसे कोई उसका उपयोग नहीं ले पाता । संकलनकर्ता :--- योगाचार्य डॉ. प्रवीण कुमार शास्त्री

चौथा आक्षेप है कि विद्वान् व्यक्ति धनी नहीं है, उसे धनी बनाना चाहिए था ।

विद्वान व्यक्ति के पास धन होता तो वह सत्य प्रकट नहीं करता और निश्चल नहीं होता । जिसके पास धन होता है किसी भी बात को सत्य बात को प्रकट करने में हिचकिचाता है और जो विद्या का धनी होता है लेकिन निर्धन होता है वह सीना तान कर भी बहुत कुछ कर सकता है । स्वामी दयानंद जो कह सकते थे विद्वान होकर निर्धन होकर वह और कोई नहीं कह सकता था । उनके समकालीन अनेक विद्वान ऐसे थे जो बहुत धनी थे । उनके सामने कहने से घबराते थे, डरते थे, किंतु एकांत में अपने मित्रों के पास जाकर कहते थे कि दयानंद जो कहता है सत्य कहता है, किंतु उनके सामने कहने की हिम्मत नहीं होती तो केवल दयानंद ही ऐसा कह सकते थे जो निर्धन थे किंतु विद्या के बहुत बड़े धनी थे । धनी व्यक्ति आलसी हो जाता है और विद्या में उन्नति नहीं कर पाता है ।  

इसलिए कहना चाहिए कि परमात्मा की बनाई हुई सृष्टि संपूर्ण है उसमें कोई त्रुटि नहीं है । जो कोई त्रुटि कहता है, वस्तुतः उसकी समझ विकसित नहीं हुई है ।

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