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जीवन में सुख-दुःख का चक्र चलता रहता है।
कुछ लोग ऐसे होते हैं जो बड़ी से बड़ी विपदा को भी हँसकर झेल जाते हैं।
विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा,
सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः ।
यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ,
प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम् ।।
(नीतिशतकम् ५९)
विपत्ति में धैर्य ,समृद्धि में क्षमाशीलता , सभा में वाक्पटु , युद्ध में पराक्रम ,यशस्वी ,वेद शास्त्रों का ज्ञाता ,ये छः गुण महापुरुषों में स्वाभाविक रूप से होते हैं ।
कुछ लोग ऐसे होते हैं जो एक दुःख से ही इतने टूट जाते हैं कि, पूरे जीवन उस दुःख से मुक्त नहीं हो पाते हैं। हमेशा अपने दुःख को सीने से लगाये घूमते रहते हैं।
जबकि हकीकत यह है कि जो बीत गया सो बीत गया। अब उसमे तो कुछ नहीं किया जा सकता, पर इतना जरूर है कि उसे भुलाकर अपने भविष्य को एक नई दिशा देने के बारे में तो सोचा ही जा सकता है।
हम बच्चों को बहुत सारी बातें सिखाते हैं मगर उनसे कुछ भी नहीं सीखते।
बच्चों से भूलने की कला हमको सीखनी चाहिए। हम बच्चों पर गुस्सा करते हैं, उन्हें डांटते भी है लेकिन बच्चे थोड़ी देर बाद उस बुरे अनुभव को भूल जाते हैं।
सर्वं परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम् ।
एतद्विद्यात्समासेन लक्षणं सुखदुःखयोः ।।
अर्थात जो कार्य दूसरे के अधीन में होता है वह सदैव मनुष्य को दुःख प्रदान करता है और जो कार्य अपने वश में होता है अथवा अपने नियन्त्रण में होता है वह सदैव सुख देने वाला होता है । संक्षेप में यही सुख और दुःख के लक्षण समझने चाहिए ।
लेखक :--- योगाचार्य डॉक्टर प्रवीण कुमार शास्त्री
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