!!!---: त्याग में सुख :---!!!
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"नास्ति त्यागसमं सुखम् ।"
इस संसार में किसी भी व्यक्ति वस्तु या स्थान से मोह नहीं करना चाहिए । मोह करने से दुःख बढ़ता है "नास्ति रागसमं दुःखम्" राग अर्थात् राग के समान कोई दूसरा दुःख नहीं हो सकता । जब हम वस्तु, व्यक्ति, स्थान का त्याग करते हैं, तब उससे अलौकिक आनंद की प्राप्ति होती है । एक कथा सुनिये :----
राजा विक्रमादित्य के राज्य में एक सदाचारी, सन्तोषी ब्राह्मण रहता था। वह निर्धन था, किंतु जितना धन था उसमें संतोष करता था । उसकी स्त्री इससे दुःखी रहती थी । एक बार स्त्री की प्रेरणा से धन प्राप्ति के निमित्त घर से निकला । नगर की ओर जा रहा था । रास्ता वन से होकर गुजरता था । चलते चलते वन में एक महात्मा से भेंट हुई । उन्होने उसे चिन्तित देख आश्वासन दिया और विक्रमादित्य को प्रत्र लिखा कि तुम्हारी इच्छा पूर्ति का अब समय आ गया है। अपना राज्य इस ब्राह्मण को देकर यहाँ चले आओ।
वह निर्धन ब्राह्मण पत्र लेकर राजा विक्रमादित्य की सभा में पहुंचा और वह पत्र विक्रमादित्य को दिया । उस पत्र विक्रमादित्य ने पढ़ा तो उन्हें बडी प्रसन्नता हुई और ब्राह्मण को राज्य साँपने की तैयारी की। ब्राह्मण ने राजा को राज्य- त्याग के लिए इतना उत्सुक और अत्यन्त आनन्दविभोर देखा तो सोचने लगा कि जब राजा ही राज्य सुख को लात मारकर योगी के पास जाने में विशेष आनन्द अनुभव कर रहे है तो योगी के पास अवश्य ही कोई राज्य से भी बड़ा सुख है। अत: उसने राजा से कहा, '' महाराज। मै अभी महात्मा जी के पास पुन : जा रहा हूँ, लौटकर राज्य लूँगा। '' यह कहकर वह योगी के पास पहुँचकर बोला, '' भगवन्। राजा तो राज्य- त्याग कर आपके पास आने के लिए नितान्त उतावला और हर्ष विभोर हो रहा है । इससे जान पड़ता है कि आपके पास राज्य से भी बड़ी कोई वस्तु है, मुझे वही दीजिए। ''
महात्मा ने प्रसन्नचित्त हो ब्राह्मण देवता को आत्मविद्या सिखाई और उसे वह वैभव दे दिया जो उसे मोक्ष दिला गया। उस सुख की तुलना में सारे सांसारिक सुख नगण्य है।
जो आत्मावलम्बी बहुरंगीय दुनिया के सुख- आकर्षणों को ठुकराता है, अन्तत : वही इस श्रेय का भागी बनता है। जो क्षणिक सुख लाभ के मोह में उन्हीं में लिप्त हो जाते हैं थे अन्ततः दुःखी होते हैं, भले ही उन्हें उसमें तात्कालिक दृष्टि से सुख मिलता हो। उनकी उपमा तो उस बालक से ही दी जा सकती है जो खिलौनों से खेलकर सामयिक आनन्द पाने में ही रुचि लेता है। आयु की दृष्टि से बड़े होने पर भी ऐसे मन्दबुद्धि बालकों का अनुपात जन समुदाय में अधिक ही होता है। इसलिए त्याग करें । घर में जितना कम सामान ला सके उतना अच्छा ।
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