!!!---: त्यागपूर्वक उपभोग :---!!!
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यह सारी सृष्टि हमारे लिए ही हैं, किंतु इसका उपभोग त्यागपूर्वक करना चाहिए । सायनाचार्य ने लिखा है :---
"जीवानामुपभोगार्थं हि सृष्टिः ।"
त्याग भाव से जीवन के सब पदार्थों को भोगना चाहिए परमात्मा ने हमें सब पदार्थ दिए हैं । यह सब हमारे भोग के लिए हैं । यह सृष्टि और इसके सब उपकरण हमारे उपभोग के लिए बनाए गए हैं । यदि जीवों के उपभोग के लिए ना बनाए जाते, तो इनका बनाया जाना है व्यर्थ हो जाता :---
"तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः ।" (यजुर्वेद ४०/१)
मनुष्य अपने जीवन में चल एवं अचल संपत्ति का उपार्जन करता है । जीवन निर्वाह के लिए धन कमाता है । लोभ प्रवृत्ति को संतुष्ट करने के लिए धन संग्रह करता है । आजीविका एवं निवास के लिए जितनी आवश्यक भूमि अथवा संपत्ति चाहिए, उसका तो संग्रह करता ही हैं । लोभ को संतुष्ट करने के लिए इनका अधिक से अधिक उपार्जन भी करता है । धन संपत्ति और भूमि का अधिकार भी मनुष्य को दिया गया, परंतु प्रतिबंध है कि त्याग पूर्वक करो ।
लेखक :--- योगाचार्य डॉ. प्रवीण कुमार शास्त्री
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